1. आप जानते हैं कि ऊसरभूमि में कोई बीज न तो उगता है और न कोई उपज होती है। उसी प्रकार भावनारहित उपासना निरर्थक है, बेकार है। इससे कोई भी फायदा नहीं हो सकता। मनुष्य के अंदर राग, द्वेष, अहंकार, कटुता आदि भरा हुआ है। इसके रहते गायत्री मंत्र का लाभ नहीं मिल सकता है। यह निकालने का कार्य गुरु करता है। गुरु यानी प्रकाश अर्थात प्रकाश की स्थापना होने पर अंधकार स्वयं भाग जाता है।
2. संवेदना का मतलब है-समान वेदना। किसी की पीड़ा को देखकर हम तड़प उठें। हमारा चिंतन उसके दुःख के निवारण में सक्रिय हो जाए। हमारे हाथ-पैरों में उसकी सेवा के लिए अकुलाहट भर जाए, यही संवेदना है। संवेदना जब सक्रिय होती है, तो अस्तित्व की सारी शक्तियों को एकसूत्र में पिरोकर इच्छित दिशा में अग्रसर कर देती है। कर्म और चिंतन अपने आप भावनाओं के बड़प्पन में बँध जाते हैं।
उदारता और सहिष्णुता के अंकुरित होते ही स्वार्थ एवं अहं की वृत्तियाँ अपने आप निष्प्राण-निस्तेज होने लगती हैं। उदारता हमारे स्वार्थ को पराजित करती है और सहिष्णुता की उष्णता अहं को गलाती है। इन दोनों को संवेदना के शाश्वत जीवन मूल्य से उपजे प्रारंभिक जीवन मूल्य कह सकते हैं। क्योंकि इनके अभाव में स्वार्थ एवं अहं की समाप्ति असंभव है। 3. संग्रह का मतलब है-स्वयं पर अविश्वास । ईश्वर पर अश्रद्धा और भविष्य की अवज्ञा । जब पिछले दिनों हम अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं का अर्जन करते रहे तो कल नहीं कर सकेंगे, इसका कोई कारण नहीं। यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ ईश्वरीय कृपा से अंतिम साँस तक मिलते रहेंगे। नियति ने उसकी समुचित व्यवस्था पहले से ही कर रखी है। तृष्णा तो ऐसी बुद्धिहीनता है जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन रहने पर भी निरंतर अतृप्तिजन्य उद्विग्नता में जलती रहती है!
4.बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, लोग उसे पीते हैं और नहाते हैं। गड्ढे में रुका हुआ पानी सड़ जाता है, पीने योग्य नहीं रहता। कृपणता रुके हुए गड्ढे की तरह है, उसका संचय सड़कर दुर्गंध ही उत्पन्न करता है। गड्ढे की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है। ऐसी दुर्गति से बचें एवं उदार जीवन की गरिमा समझें देते रहने का 1 आनंद पाएँ।
5. निःस्वार्थ सेवा से अहंकार, घृणा, ईर्ष्या जैसे दोषों से मुक्ति पाई जा सकती है। इससे भेदभाव, ऊंच-नीच का भाव मिटता है। पवित्रता पनपती है, जीवन के प्रति दृष्टिकोण विशाल होता चला जाता है। सबमें एक और एक में सबकी अनुभूति होने फिर सेवा की पूजा में बदल जाति हैं
6. मनुष्य उलझनें स्वयं ही विनिर्मित करते हैं, यदि वे अपनी चाल उलट दें तो सारी गुत्थियों को सुलझाने में सहज समर्थ हो सकते हैं।
7. हँसी-खुशी का हलका-फुलका जीवन शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं आर्थिक सभी पक्षों को प्रभावित करता है और सुखद संभावनाएँ विनिर्मित करने में भारी योगदान देता है। यह कठिन नहीं अति सरल है। चिंतन में थोड़ा ही हेर-फेर करके हम खिन्न- उद्विग्न जीवन को हँसता-हँसाता बनाने में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
8. कठिन समय में भी चिंतन का परिष्कृत स्तर मन का भार हलका करने में बहुत सिद्ध हो सकता है। खोज करने पर प्रतीत होगा कि दुखी मनःस्थिति का बहुत बड़ा कारण सही ढंग से सोच सकने में त्रुटि रहना ही था। उसे सुधार लेने पर अधिकांश समस्याओं का हल मिल जाता है। फिर भी जो रह जाए उसे हर किसी को कुछ न कुछ कमी, कठिनाई रहने के सामान्यक्रम को ऐसे ही हँसते-हँसते सहन किया जा सकता है।
