पियाजे का संज्ञानात्मक विकास
सिद्धांत पियाजे के अनुसार बच्चा अपने वातावरण के साथ अन्तक्रिरया के परिणामस्वरूप ही सीखता है। संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य चिंतन में गुणात्मक परिवर्तन से है तथा यह परिवर्तन पहले से उपसिथत संज्ञानात्मक संरचनाओं में अनुकूलन द्वारा होता है। यह परिवर्तन अपरिहार्य व अपरिवर्तनीय तथा जैव-निर्धरित होता है। संक्षेप में पियाजे के अनुसार बालकों में वास्तविकता के स्वरूप में चिंतन करने, उसकी खोज करने, उसके बारे में समझ बनाने तथा उनके बारे में सूचनाएँ एकत्रित करने की क्षमता, बालक के परिपक्कता स्तर तथा बालक के अनुभवों की पारस्परिक अन्तः क्रिया द्वारा निर्धारित होती है। बालक अपने विश्व की ज्ञान रचना में स्कीमा का प्रयोग करता है।
• संज्ञानात्मक विकास की संकल्पनाएं स्कीमा आत्मसातीकरण, समायोजन व साम्यधारण ,
* पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत
बच्चो में संवेग
बच्चों का सर्वगात्मक वातावरण, उसके व्यक्तित्व के भावात्मक तत्व और निशिचत पदार्थों, व्यक्तियों और परिसिथतियों के प्रति उसके भाव से निर्मित होता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है और विकसित होता है, उसके अनुभव तथा ज्ञान की सीमा विस्तृत होती जाती है, उसकी अन्योन्यक्रिया बढ़ती जाती है तथा उसे प्रभावित करने वाले व्यक्तियों की संख्या भी बढ़ती जाती है। अपने माता-पिता, मित्रा, भाई-बहन, शिक्षक और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों से उसके पारस्परिक संबंध और उनके प्रति अपनी संवेदनाओं के द्वारा ही बच्चा प्रमुख रूप से निर्देशित होता है। क्या बच्चा इन सबके बारे में अच्छा महसूस करता है? क्या इनकी उपेक्षा करता है? क्या उनसे स्नेह का भाव रखता है? क्या वह अपनी छोटी बहन या भाई से ईष्या करता है? ये सभी प्रश्न बच्चे के भावात्मक पक्ष को दर्शाते हैं। बच्चों की संवेदना महत्त्वपूर्ण होती है, यह उसके पारस्परिक संबंध की दिशा तथा उत्कृष्टता का निर्धारण कर उसके स्वभाव को निशिचत रूपरेखा प्रदान करती है। एक बच्चा जो अपनी माँ से स्नेह करता है, उसे खुश करने के लिए वह सब कुछ करता है जो वह कर सकता है, इसके विपरीत यदि वह किसी व्यक्ति से घृणा करता है तो उसका व्यव 4/5 बहुत नकारात्मक तथा घृणा से भरा हुआ होगा। संवेग की प्रकृति सकारात्मक तथा नकारात्मक दोना प्रकार की होती है। वे संवेग जो प्रेम, प्रशंसा, दया तथा खुशी जैसे सकारात्मक परिणाम के रूप में व्यवहार में नजर आते हैं, उन्हें सकारात्मक संवेग कहते है। दूसरी तरपफ जो अवांछित, अप्रीतिकर और हानिकारक व्यवहार जैसे ईष्र्या, क्रोध, घृणा इत्यादि के रूप में दृष्टिगत होते हैं उन्हें नकारात्मक संवेग कहते हैं।
संवेग का विकास-
संवेगात्मक विकास विशिष्ट और व्यक्तिपरक होता है परंतु सामान्य रूप में कुछ प्रवृत्तियों सभी बच्चों में मौजूद होती है। सभी जानते हैं कि नवजात बच्चा अत्यधिक उत्तेजित होता है और उसके संवेग विसरित और सामान्य रूप में अभिव्यक्त होते है। प्रारंभिक बाल्यावस्था में, सवेग जैसे क्रोध भय और प्रेम, स्वतंत्रारूप से, अल्प अवधि के लिए तथा स्वाभाविक रूप से व्यक्त किए जाते हैं। जबकि वयस्कों का स्वभाव अपेक्षाकृत जटिल होता है उनके संवेग मिश्रित होते हैं, दमित होते हैं, इनके संवेगों में भावों को व्यक्त करने से रोका जाता है और वे अपेक्षाकृत लंबे समय तक बने रहते हैं। संवेगों का विकास, बाल्यावस्था के सहज, स्वतंत्रा तथा संक्षिप्त अभिव्यक्त संवेगों से वयस्क अवस्था के दिल, समयतक चरवाला तथा निर्वाचित संवेग, तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया को व्याख्यायित करता है।
संवेगात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास या नैतिक विकास की तरह प्रतीकात्मक चरणों या पथों का अनुसरण नहीं करता है। इसी प्रकार कोई सर्वगात्मक आयु, मानक या सर्वगात्मक ग्रहणीकरण की विशिष्ट प्रक्रिया नहीं होती है। इसलिए प्रत्येक बच्चे को उसकी विशिष्टता तथा व्यतिफकता के आजार पर मूल्यांकित किया जाना चाहिए न कि समूह मानदण्ड के आधर पर ऐसा इसलिए है क्योंकि संवेग जटिल तथा भिन्नता दिखलाने वाले होते हैं। उदाहरणस्वरूप, एक माँ जो अपने बच्चे को आज्ञा उल्लंघन करने की सजा देती है, तो यह व्यवहार बच्चे में दो अलग- अलग प्रकार के संवेग उत्पन्न करता है। यदि बच्चे और माँ का संबंध स्नेहपूर्ण तथा सुरक्षित है तो वह सजा के प्रति प्रतिक्रिया नही तोता और माँ को दिया दुदण्ड सहर्षकार करेगा परंतु वह बच्चा जो अपनी माँ के साथ सुरक्षा का भाव महसूस नहीं करता वह हिंसक रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा और अपनी माँ के प्रति बहुत तीव्र घृणा का भाव विकसित कर सकता है। बच्चों में सर्वगात्मक परिपक्वता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण अवधारणा 'संवेगात्मक स्वास्थ्य है। सर्वगात्मक परिपक्वता, अपने संवेगों को समाज के द्वारा स्वीकार्य बनाने के लिए किये जाने वाले नियंत्राण की क्षमता को प्रदर्शित करती है। या एक अहानिकर तरीका जो केवल युवावस्था में स्वयं को व्यक्त करने की क्षमता है जबकि संवेगात्मक स्वास्थ्य किसी भी निर्दिष्ट समय में व्यक्ति की संवदेनात्मक अवस्था को दर्शाता है। सकारात्मक संवेगात्मक संवेग ही महसूस करना चाहिए। जबकि भय और कोट जैसे संवेगों की अनुभूति बिल्कुल स्वाभाविक है, परन्तु इनकी अत्यधिक प्रभावशीलता तथा महता व्यक्ति के संवेगात्मक स्वास्थ्य को कठिनाई में डाल देती है, जबकि भय और क्रोध से भी ज्यादा विनाशकारी चिंता का भाव होता है जहाँ भय विशिष्ट होता है तथा किसी वस्तु व्यक्ति या परिसिथति से संबंधित हो सकता है, वहीं चिन्ता विसरित तथा सामान्यीत महसूस होती है।
सामान्यतः चिन्ता के भाव से मुक्त होने के बजाय व्यक्ति के लिए किसी विशेष भय को नियंत्रित करना या उसे दूर करना ज्यादा आसान होता है। अपनी व्यापक प्रगति के कारण, बहुत से मानसिक स्वास्थ्य विज्ञानी, चिन्ता को मनुष्य के दुःख और समायोजन में आने वाली कठिनाई के रूप में देखते हैं जो तनाव और दुःख उत्पन्न करती है। इस प्रकार सकारात्मक स्मनसिक स्वास्थ्य विरका लिक भय, क्रोध, तनाव तथा चिन्ता से मुक्त एक अवस्था है।
