Ctet 2022 कोलबर्ग का नैतिक सिद्धांत

                 कोलबर्ग का नैतिक सिद्धांत ctet 2022

कोलबर्ग

कोलवर्ग के सिद्धांत पियाजे की तरह कोलबर्ग ने भी पाया कि नैतिक विकास कुछ अवस्थाओं में होता है। कोलबर्ग ने पाया कि यह अवस्थाएं सार्वभौमिक होती है। बीस साल तक बच्चों के साथ एक विशेष प्रकार के साक्षात्कार का प्रयोग करने के बाद कोलबर्ग इन निर्णयों पर पहुंचे। इन साक्षात्कारों में बच्चों को कुछ ऐसी कहानियां सुनाई गई जिनमें कहानियों के पात्रों के सामने कई नैतिक उलझने थीं। उसमें से सबसे लोकप्रिय दुविधा यह है- यूरोप में एक महिला मौत के कगार पर थी। डाक्टरों ने कहा कि एक दवाई है जिससे शायद उसकी जान बच जाए। वो एक तरह का रेडियम था जिसकी खोज उस शहर के एक फार्मासिस्ट ने उस दौरान ही की थी दवाई बनाने का खर्चा बहुत था और दवाई वाला दवाई बनाने के खर्च से दस गुना ज्यादा पैसे मांग रहा था। उस औरत का इलाज करने के लिए उसका पति हाइनज उन सबके पास गया जिन्हें वह जानता था। फिर भी उसे केवल कुछ पैसे ही उधार मिले जो कि दवाई के दाम से आधे ही थे। उसने दवाई वाले से कहा कि उसकी पत्नी मरने वाली है, वो उस दवाई को सस्ते में दे । वह उसके बाकी पैसे बाद में देगा। फिर भी दवाई वाले ने मना कर दिया। दवाई वाले ने कहा कि मैंने यह दवाई खोजी है, मैं इसे बेच कर पैसा कमाऊंगा। तब हाइनज ने मजबूर होकर उसकी दुकान तोड़ कर वो दवाई अपनी पत्नी के लिए चुरा ली। यह कहानी उन ग्यारह कहानियों में से एक हैं, जो कोलबर्ग ने नैतिक विकास को जानने के लिए इस्तेमाल की थीं। यह कहानी पढ़ने के बाद जिन बच्चों से साक्षात्कार लिया गया उन्हें नैतिक दुविधा पर बनाए गए कुछ प्रश्नों के उत्तर देने होते थे। क्या हाइनज को वो दवाई चुरा लेनी चाहिए थी? क्या चोरी करना सही है या गलत है! क्यों? क्या यह एक पति का कत्र्तव्य है कि वो अपनी पत्नी के लिए दवाई चोरी करके लाए? क्या दवाई बनाने वाले को हक है कि वो दवाई के इतने पैसे मांगे? क्या ऐसा कोई कानून नहीं है जिससे दवाई की कीमत पर अंकुश लगाया जा सके, क्यों और क्यों नहीं?

कोलबर्ग के द्वारा दी गई अवस्थाएं

साक्षात्कार द्वारा दिए गए उत्तरों के आधार पर कोलबर्ग ने नैतिक चिंतन की तीन अवस्थाएं बताई है, जिन्हें पुनः दो-दो चरणों में विभाजित किया गया है।

क. रूढ़ि पूर्व अवस्था में चिंतन 

यह नैतिक चिंतन का सबसे निचला चरण है। इस चरण में क्या सही और गलत है, पर बाहर से मिलने वाली सजा और उपहार का प्रभाव पड़ता है।

चरण 1: बाहरी सत्ता पर आधारित 

नैतिकता इस रूढि पूर्व अवस्था का पहला चरण है। यहां नैतिक सोच सजा से बधी होती है। जैसे बच्चे यह मानते हैं कि उन्हें बड़ों की बाते माननी चाहिए नहीं तो बड़े उन्हें दण्डित करेंगे

चरण 2: व्यक्तिकेंद्रित

एक दूसरे का हित साधने पर आधारित नैतिक चिंतन यह रूढ़ि पूर्व अवस्था का दूसरा चरण है। यहां बच्चा सोचता है कि अपने हितों के अनुसार कार्य करने में कुछ गलत नहीं है, पर हमें साथ में दूसरों को भी उनके हितो के अनुरूप काम करने का मौका देना चाहिए। अतः इस स्तर की नैतिक सोच यह कहती है कि वही बात सही है जिसमे बराबरी का लेन-देन हो रहा हो। अगर हम दूसरे की कोई इच्छा पूरी कर दे तो वे भी हमारी इच्छा पूरी कर देंगे। 

ख. रूढिगत चिन्तन 

यह कोलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांतों की दूसरी अवस्था है। इस अवस्था में लोग एक पूर्व आधारित सौच से चीजों को देखते है। जैसे देखा गया है कि अक्सर बच्चों का व्यवहार उनके मां-बाप या किसी बड़े व्यक्ति द्वारा बनाए गए नियमों पर आधारित होता है।


चरण 3: अच्छे आपसी व्यवहार व सम्बन्धों पर आधारित नैतिक चिन्तन

 यह कोलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांतों की तीसरी अवस्था है। इस स्थिति में लोग विश्वास दूसरों का ख्याल रखना, दूसरी के निष्पक्ष व्यवहार का अपने नैतिक व्यवहार का आधार मानते है। बच्चे और युवा अपने माता-पिता द्वारा निर्धारित किये गए नैतिक व्यवहार के मापदण्डों को अपनाते है जो उन्हें उनके माता-पिता की नजर में एक "अच्छा लड़का या अच्छी लड़की बनाते हैं।

चरण 4: सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने पर आधारित नैितिक चिन्तन

 यह कोलवर्ग के सिद्धातों की चैथी अवस्था है। इस स्थिति में लोगों के नैतिक विकास की अवस्था सामाजिक आदेश, कानून, न्याय और कर्तव्यों पर आधारित होती है जैसे किशोर सोचते हैं कि समाज अच्छे से चले इसके लिए कानून के द्वारा बनाए गए दायरे के अन्दर ही रहना चाहिए।

ग. रूढ़ि से ऊपर उठकर नैतिक चिन्तन

 कोलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांतों की पांचवी अवस्था है। इस स्थिति में वैकल्पिक रास्ते खोजे जाते हों और फिर अपना एक व्यक्तिगत नैतिक व्यवहार का रास्ता ढूढा जाता है।

चरण 5: सामाजिक अनुबन्ध, उपयोगिता और व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित नैतिक चिन्तन 


यह कोलबर्ग के सिद्धांत की पांचवी अवस्था है। इस अवस्था में व्यक्ति यह सोचने लगता है कि कुछ मूल्य. सिद्धांत और अधिकार कानून से भी ऊपर हो सकते हैं। व्यक्ति वास्तविक सामाजिक व्यवस्थाओं का मूल्यांकन इस दृष्टि से करने लगता है कि वे किस हद तक मूल अधिकारों व मूल्यों का सरक्षण करते हैं। चरण 

6: सर्वभौमिक नीति सम्मत सिद्धांतों पर आधारित नैतिक चिन्तन 

यह कोलबर्ग के नैतिक सिद्धान्तों की सबसे ऊंची और छठी अवस्था है। इस अवस्था में व्यक्ति सार्वभौमिक मानवाधिकार पर आधारित नैतिक मापदण्ड बनाता है। जब भी कोई व्यक्ति अन्तआत्मा की आवाज के दवद के बीच फसा होता है तो वह व्यक्ति यह तर्क करता है कि अन्तआत्मा की आवाज के साथ चलना चाहिए. चाहे वो निर्णय जोखिम से भरा ही क्यों न हो। इसीलिए उसे कुछ भी करने से पहले अपनी भावनाओं के अलावा और की जिन्दगी के बारे में भी सोचना चाहिए था। कोलबर्ग मानते है कि यह स्तर एवं अवस्थाएं एक क्रम में चलते हैं और उम्र से जुड़े हुए हैं। 9 साल की उम्र से पहले बच्चे पहले स्तर पर काम करते है। अधिकतर किशोर तीसरी अवस्था में सोचते पाए जाते है पर उनमें दूसरी अवस्था और चैथी अवस्था के सोच विचार के कुछ लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। प्रारंभिक वयस्कता में पहुँचने पर कुछ थोड़े से लोग ही रूढ़िपूर्णता से ऊपर उठकर नैतिक तर्क देते है।



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