Urdu shayari

हजारों इंसा के लाखों ख़ुदा के सूरज हैं 

चले जो साथ मिरे वो ही मेरे सूरज हैं 


कभी गमों के कभी आंसुओं के सूरज हैं 

उदास रह के भी हम तो चमकते सूरज हैं 



अजब तरह की है जम्हूरियत' कि सब के लिए

 यह हाकिमों ही के बच्चे चहेते सूरज हैं 


कभी न खत्म हो दिल और दिमाग का रिश्तः

 अकेले जब भी हों दोनों भटकते सूरज हैं


 मिरा तो वो है जो मेरी ज़मीं को रास आए 

कि काइनात' में यूं तो बहुत से सूरज हैं 


न मांग मुझसे तू अब चांद और सितारों को

 कि मेरे पास तो जलते सुलगते सूरज हैं 


ज़मीं के गिर्द भी कुछ घूमते हैं ऐ "जाहिद"

 ये चांद तपती हुई ख्वाहिशों के सूरज हैं


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