हजारों इंसा के लाखों ख़ुदा के सूरज हैं
चले जो साथ मिरे वो ही मेरे सूरज हैं
कभी गमों के कभी आंसुओं के सूरज हैं
उदास रह के भी हम तो चमकते सूरज हैं
अजब तरह की है जम्हूरियत' कि सब के लिए
यह हाकिमों ही के बच्चे चहेते सूरज हैं
कभी न खत्म हो दिल और दिमाग का रिश्तः
अकेले जब भी हों दोनों भटकते सूरज हैं
मिरा तो वो है जो मेरी ज़मीं को रास आए
कि काइनात' में यूं तो बहुत से सूरज हैं
न मांग मुझसे तू अब चांद और सितारों को
कि मेरे पास तो जलते सुलगते सूरज हैं
ज़मीं के गिर्द भी कुछ घूमते हैं ऐ "जाहिद"
ये चांद तपती हुई ख्वाहिशों के सूरज हैं
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