Sad Urdu shayari

 किसी से रिश्त-ए-उम्मीद जोड़ता क्यू है

 लहू खुद अपनी रंगों का निचोड़ता क्यूं है


 तिरे मिजाज की गफलत का जाइज़ ले कर 

वो सो गया है उसे अब झंझोड़ता क्यूं है



 कोई लगाम तो अपने भी हाथ में रख ले

 हर इक समंदी को किस्मत पे छोड़ता क्यूं है 


अगर तू कृष्ण सा निर्मोही बन नहीं सकता

 तो जिन्दगी की कलाई मरोड़ता क्यूं है 


ये तेरे मेरे सभी के घरों की जीनत हैं

 रिवायतें तो हैं आईन तोड़ता क्यूं है 


लुगात-ए-दिल में ख़ुदा के बहुत मआनी हैं

 हर एक संग पे सर अपना फोड़ता क्यूं है 


पटक के फर्श पे "जाहिद किसी का जाम-ए-नज़र 

बने बनाए घरौंदों को तोड़ता क्यूं है

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