चोकर( bran) से क्या होता है

 खाद्यान्नों को पिसवाकर प्रायः उन्हें छाना जाता है । छानने में गेहूँ, ज्वार, मक्का आदि अनाज का ऊपरी छिलका छलनी में ही रह जाता है । गृहिणियाँ इस छिलके को जिसे बोलचाल की भाषा में चोकर कहती हैं या तो फेंक देती हैं अथवा पशुओं को डाल देती हैं। यदि यह मालूम हो सके कि इस प्रकार अनाज का सबसे अधिक पौष्टिक भाग व्यर्थ चला जाता है, तो बहुत से लोग इस प्रकार की गलती नहीं करेंगे। कई लोग तो ऐसे भी होते हैं जो चोकर(bran) के


लाभकारी गुणों को जानते हुए भी उसे निकाल- छानकर फेंक देते हैं। इसे तो स्वाद लिप्सा का दुर्गुण ही कहा जाएगा। जिसकी किसी भी प्रकार अनुशंसा नहीं की जानी चाहिए। ऐसे लोगों को समझा सकना भी मुश्किल है। ब्रिटेन में काफी वर्षों पहले चोकर के गुणों की जाँच की जा चुकी है। वैज्ञानिकगण प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस प्रकार खाद्य पदार्थों के सर्वाधिक पोषकतत्त्व नष्ट हो जाते हैं। वहाँ तो इसका प्रयोग कई भयंकर बीमारियों के उपचार में पथ्य रूप में भी किया जाता है। तपेदिक, कब्ज, मंदाग्नि तथा मधुमेह जैसे रोगों की कुछ विशेष अवस्थाओं में एक भाग चोकर और आठ भाग गेहूँ के आटे की रोटियाँ ही खाने को दी जाती हैं। स्नायु दुर्बलता एवं रक्ताल्पता के रोगियों को चोकर की चाय बनाकर पिलाई जाती है। साफ चोकर को उसके छह गुने पानी में मिलाकर आधा घंटे तक उबालने से चोकर की चाय तैयार हो जाती है । सुस्वादु बनाने के लिए उसमें शहद, चीनी अथवा नीबू का रस भी मिलाया जा सकता है इसका एक प्याला प्रातः-सायं पीने से स्वस्थ व्यक्तियों को भी काफी लाभ होता है। इसका उपयोग कई व्यक्ति बाजार में मिलने वाली चाय के स्थान पर करने लगे हैं। एक ओर जहाँ यह पेय बाल-वृद्ध- युवा सभी के लिए स्फूर्तिदायक सिद्ध हुआ है, वहीं यह पीने वालों को गले की खराश, सरदी, जुकाम आदि से भी बचाता है। गेहूँ के वजन का पाँचवाँ भाग चोकर होता है, परंतु इस पाँचवें भाग में गेहूँ के सभी पोषक तत्त्वों का तीन-चौथाई हिस्सा समाया होता है। इसका रासायनिक विश्लेषण करने पर पता चला है कि मामूली चोकर में ३ प्रतिशत चिकनाई, बारह प्रतिशत प्रोटीन तथा एक-तिहाई भाग स्टार्च होता है। चूने और अन्य खनिज लवणों की मात्रा भी इसमें काफी होती है। एक पौंड चोकर वाले आटे में चार ग्रेन चूना होता है जो शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त है। आटे का चोकर(bran) निकाल दिए जाने पर उसका चूना भी निकल जाता है। स्मरणीय है चूना शरीर के लिए अत्यावश्यक है। प्राकृतिक रूप से यह आवश्यकता पूरी न होने पर शरीर के कई अंगों को पोषण नहीं मिल पाता। दंत-क्षय का रोग चूने के अभाव में ही होता है। अपने भोजन में बारीक छने आटे अथवा मैदे का प्रयोग करने वालों के दाँत अन्य लोगों की अपेक्षा जल्दी गिरते हैं अथवा खोखले हो जाते हैं।

डॉ० एम. बुज ने शोध परिणामों द्वारा बताया है कि आटे से चोकर निकाल देने पर उसका आधा लौहतत्त्व समाप्त हो जाता है। मैदे में तो यह तत्त्व इससे भी कम रह जाता है। ऐसे आटे में से पोटेशियम का तीन-चौथाई भाग, फास्फोरस का अस्सी प्रतिशत भाग तथा कैल्शियम का आधा भाग निकल जाता है जो शरीर और स्वास्थ्य के लिए निश्चय ही अपोषणकारी है। 

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य संतुलन और विजातीय तत्त्वों में चोकर महत्त्वपूर्ण भाग अदा करता है। कोष्ठ- शोधन में तो यह हरी सब्जियों तथा फलों की तुलना में भी ज्यादा अच्छा साबित हुआ है। कोष्ठशुद्धि के लिए उपयोग में लाई जाने वाली दवाओं की तर यह आँतों को उत्तेजित नहीं करता, बल्कि उन्हें ब और स्फूर्ति प्रदान कर सुचारु रूप से कार्य चलाता हैं और 

मदद देता है। अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि जो आटा हम काम में लाते हैं, उसमें से चोकर निकाला नहीं गया हो। एक और अद्भुत निष्कर्ष वैज्ञानिकों ने विशद अनुसंधान द्वारा निकाला है। यह विज्ञान जगत को नई दिशा देने वाला हो सकता है। हैदराबाद के पोषण अनुसंधान केंद्र के अनुसार चोकर में कुछ ऐसे तत्त्व पाए जाते हैं जो जीन्स की संरचना पर प्रभाव डालते हैं। कोलोन के अतिघातक कैंसर को रोकने में मधुमेह जैसी महाव्याधि में व्यापक परिवर्तन लाने में तथा रक्त का कोलेस्ट्रोल कम करने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका देखी गई है। पाया यह भी गया हैं। कि यह शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाकर इम्यूनोग्लोबुलीन्स की मात्रा रक्त में बढ़ाता है। ऐसी स्थिति में दमा, एलर्जी एवं एड्स जैसे रोगों में भी इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। चोकर को आटे का निस्सार भाग मानकर फेंकने के बजाय उसका यदि हम सदुपयोग करना आरंभ कर दें तो यह एक अमृतोपम औषधि की भूमिका निभा सकता है।

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक शहर में पहुँचे। वहाँ उनकी एक वृद्ध व्यक्ति से भेंट हुई। दोनों काफी घुलमिल गए। सुकरात ने उनके व्यक्तिगत जीवन में काफी रुचि ली। उन्होंने काफी खुलकर बात की। सुकरात ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा- "आपका विगत जीवन तो बड़े शानदार ढंग से बीता है, पर इस वृद्धावस्था में आपको कौन-कौन से पापड़ बेलने पड़ रहे हैं, यह तो बताइए ?" वृद्ध किंचित मुसकराया- "मैं अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने समर्थ पुत्रों को देकर निश्चित हूँ। वह जो कहते हैं, कर देता हूँ जो खिलाते हैं, खा लेता हूँ और अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ हँसता-खेलता रहता हूँ। बच्चे कुछ भूल करते हैं, तब भी मैं चुप रहता हूँ। मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता, पर जब कभी वह परामर्श लेने आते हैं, मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रख, की गई भूल से उत्पन्न दुष्परिणामों की ओर से सचेत कर देता हूँ। वह मेरी सलाह पर कितना चलते हैं, यह देखना और अपना मस्तिष्क खराब करना मेरा काम नहीं है। वह मेरे निर्देशों पर चलें ही यह आग्रह नहीं । परामर्श देने के बाद भी यदि वह भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता, उस पर भी यदि वे पुनः मेरे पास आते हैं तो मेरा दरबाजा सदैव उनके लिए खुला रहता है। मैं पुनः नेक सलाह देकर उन्हें विदा करता हूँ।" वृद्ध की बात सुनकर सुकरात बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा- "इस आयु में जीवन कैसे जिया जाए, यह आपने बखूबी समझ लिया है।"

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने