शिक्षक का क्या दायित्व होना चाहिए

 शिक्षक का दायित्व 

शिक्षा एक प्रतिपादन है, उसका मूर्तरूप शिक्षक है । अध्यापक को अपनी गरिमा समझने और चरितार्थ कर दिखाने में वर्तमान परिस्थितियाँ भी बाधा नहीं पहुँचा सकतीं। जहाँ तक शिक्षणतंत्र के वेतनमान, सुविधा-साधनों को बढ़ाए जाने की बात है, वहाँ तक तो अधिकाधिक साधन जुटाने का समर्थन ही किया जाएगा, पर इसमें यदि कुछ कमी रहे, अड़चन पड़े तो भी यह तो हो ही सकता है कि अध्यापकगण अपनी गुरुगरिमा को अपने ही बलबूते बनाए रहें और अपने गौरव का महत्त्व अनुभव करते हुए बढ़ते चलें ।

विद्यार्थी अपने समय का महत्त्वपूर्ण भाग अध्यापकों के साथ रहकर विद्यालयों में गुजारते हैं। उनके प्रति सहज श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी रहता है। उनके उपकारों को कोई कैसे भुला सकता "है ? उनसे आयु में ही नहीं, हर हालत में छोटी स्थिति वाले छात्रों पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व की छाप पड़नी ही चाहिए।

स्कूली पढ़ाई पूरी कराना तो आवश्यक है ही। इसे वेतन के लिए किया गया परिश्रम भी माना जा सकता है, पर बात इतने तक सीमित नहीं समझी जा सकती है। करणीय यह भी है कि अध्यापक अपने संपर्क के छात्रों में शालीनता, सज्जनता, श्रमशीलता, जिम्मेदारी, बहादुरी, ईमानदारी और समझदारी जैसी सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने में कुछ उठा न रखें। इन्हीं प्रयत्नों में निरत रहने वाले शिक्षक समूचे समाज को अपना ऋणी बना सकते हैं। स्वयं ही अपनी गरिमा में भी चार चाँद लगा सकते हैं।

बच्चों के जीवन-निर्माण की सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने के लिए उन्हें उपयुक्त, अनुरूप साहित्य पढ़ाया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्तकों में भी इस प्रकार के उपयोगी पाठों की कमी नहीं रहती। इसके अतिरिक्त यदि अध्यापक चाहें और प्रयत्न करें तो न केवल सकता है। तात्पर्य यह है कि कोई अध्यापक कोई भी विषय क्यों न पढ़ा रहा हो, उसको समझाते समय शैली में किसी भी संस्कार के लिए विचारों का पुट दे सकता है। विद्यार्थियों में विषय के प्रति ऊँची भावना जगाते हुए उदात्त मनोवृत्ति का । बीज बो सकता है, जो कि आगे चलकर किसी भी दिशा में वांछित फल ला सके।

शिक्षक बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखाते, किंतु जब अपने गलत व्यवहार और चारित्रिक त्रुटियों नसे बच्चों के सामने गलत आचरण करते हैं, तो यह एक अक्षम्य सामाजिक अपराध ही है। हम देखते हैं कि छोटे-छोटे बच्चों के समक्ष अध्यापक लोग बीड़ी पीते हैं । भद्दे हँसी-मजाक करते हैं। अपने दोस्तों के लिए बच्चों के द्वारा बीड़ी, पान, सिगरेट मँगवाते हैं।  बड़े स्कूल, कॉलेजों में विद्यार्थियों के साथ हँसी मजाक बराबरी का व्यवहार कई अनर्गल विषयों पर  वार्तालाप करना, अपना चारित्रिक स्तर निम्न रखने, जैसी कई बातें हैं जो विद्यार्थियों के समक्ष गलत.  उदाहरण पेश करती हैं।

हमारे देश, समाज, सभ्यता, संस्कृति का भार  बहुत कुछ शिक्षकों के कंधों पर ही है। अपने इस उत्तरदायित्व को समझते हुए बच्चों के उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण करने में अधिकाधिक प्रयास  आवश्यक है। आज शिक्षकों की यह बहुत बड़ी कार जिम्मेदारी है। जो भी पाठ्यक्रम सामने हैं, उनमें से  जिन प्रसंगों में सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणाम और  दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम निकलते दृष्टिगोचर होते.हैं, उन्हें अपनी टिप्पणियों के साथ इस तरह पढ़ाएँ, जिससे छात्रों को भलाई और बुराई का अंतर तथा उसका प्रतिफल समझने का अवसर मिले।

नैतिक शिक्षा कहने-सुनने में तो सरल है, पर वह अति कठिन है। इसके लिए सबसे पहले अध्यापक को अपना बाहरी और आंतरिक जीवन ऐसे ढाँचे में ढालना होता है, जिसका अनुगमन करते हुए संबंधित छात्र अनायास ही प्रामाणिकता एवं शालीनता के ढाँचे में ढलने लगें। वाणी से दिए जाने वाले मार्गदर्शन के साथ-साथ उन्हें चरित्र द्वारा दिए जाने वाले शिक्षण की विद्या विकसित करनी होगी। उसमें घाटा कहीं भी नहीं है। छात्रों, अभिभावकों के श्रद्धापात्र बनते ही शिक्षकों को वह उच्चस्तरीय सम्मान और सहयोग प्राप्त होने लगता है, जिसके लिए बड़े बड़े नेता, अधिकारी तरसते हैं।

गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कार कर लेने पर व्यक्ति अपने लिए, परिवार के लिए, समाज के •लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यह सब इस प्रकार समझाया जाना चाहिए, जिसमें गहरे तर्क, प्रभावोत्पादक तथ्य और उन उदाहरणों की भरमार हो, जिनमें आदर्श अपनाने पर मिलने वाले अनेकानेक लाभों का विस्तारपूर्वक वर्णन हो । साथ ही यह भी बताया जाए कि सद्गुणों की, सत्प्रवृत्तियों की उपेक्षा-अवहेलना करने पर व्यक्ति किस प्रकार अनगढ़ बना रहता है और पतनोन्मुख परिस्थितियों के दलदल में फिसल जाता है। वस्तुतः यही शिक्षा का प्राण हैं

सक्रिय विचारक्रांति की सफलता के लिए चुने जाने वाले वर्गों में से अध्यापकों से विश्वासपूर्ण अपेक्षा करने का विशेष कारण यह है कि अध्यापक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक जागरूक, चिंतक, स्रष्टा, संतोषी तथा उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। उसका ऐसा होना स्वभावतः इसलिए है कि वह देश के भावी नागरिकों का निर्माता होता है। वह अपने छात्रों को जिस प्रकार का बनाकर समाज को देगा, ठीक उसी प्रकार का प्रशासन तथा राष्ट्र बनेगा।

अध्यापक महानुभावों से निवेदन है कि वे अपनी गरिमा को समझें। यदि अध्यापक स्वयं को एक शिक्षाकर्मी के रूप में, सरकारी सेवारत कर्मचारी के रूप में देखता है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का कुछ हो नहीं सकता।

हमें अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी है, आत्मसम्मान की रक्षा करनी है और यह तभी संभव है जब हम अपने दायित्व को समझें और उसके निर्वाह में कोताही न बरतें। शिक्षकों का दायित्व महान है। वह ओछे चिंतन, ओछे व्यक्तियों की भावनाओं द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। शिक्षक व्यक्तित्व निर्माण का ढाँचा है। जैसा ढाँचा होता है, वैसे ही प्रतिरूप ढलते हैं। शिक्षक छात्र के लिए आदर्श है, वह उसका अनुकरण करता है। श्रद्धा और सम्मान इसी शर्त पर प्राप्त होता चला जाता है। जहाँ कथनी और करनी भिन्न दिखाई देती हैं, वहीं श्रद्धा और सम्मान में कटौती होती चली जाती है और फिर शिक्षक एक अभिनेता से अधिक और कुछ नहीं रह जाता।

हमें अपने प्राचीन गौरव को समझना चाहिए, पर उसे खो देने के कारणों पर विचार कर अपने आप को बदलना चाहिए। एक शेर का बच्चा भूल से भेड़ियों के झुंड में चला गया। समयांतर में वह यह भूल ही गया कि वह शेर का बच्चा है। जब एक शेर ने उसे उसकी शक्ति का आभास कराया तो वह बहुत पछताया। 

शासन और समाज शिक्षकों के लिए समुचित शिक्षण की व्यवस्था जुटाए यह आवश्यक है। शिक्षकों के लिए एक सामान्य राष्ट्रीय स्तर का जीवनयापन करने की सुविधा उपलब्ध कराना भी शासन और समाज का दायित्व है। समुचित व्यवस्था के अभाव में शिक्षण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसे प्राप्त करना शिक्षकों का अधिकार है। अधिकार प्राप्त करने का प्रयास करना तो उचित है, लेकिन उसके अभाव में अपने कर्त्तव्य को पूरा न करना एक जघन्य अपराध है। शिक्षक महान है, उसे अधिकार से अधिक कर्त्तव्य र का ध्यान रखना है। अधिकार और कर्त्तव्य में से एक चुनना हो तो पहले कर्त्तव्य को चुनना है। परमात्मा ने जिस दायित्व को निभाने के लिए हमें चुना है, उसे हम कितना पूरा कर रहे हैं, इसका आत्मावलोकन हमें निरंतर करते रहना चाहिए। : शिक्षकवर्ग सरस्वती के साधक हैं, गणेश हैं। इनको निर्देश देना धृष्टता ही होगी। महाकाल की दिव्य चेतना शिक्षकों से कई अपेक्षाएँ रखती है। आशा है युग की पुकार अनसुनी न की जाएगी।

भारतीय संस्कृति, देव संस्कृति है। इस संस्कृति का पूरा दर्शन गायत्री छंद में सूत्र रूप में समाहित है। इसका दर्शन सभी छात्रों को समझाया जाना चाहिए और उसका नित्यप्रति स्मरण करने हेतु प्रार्थना सभा में पाँच बार सस्वर उच्चारण कराया जाना चाहिए।

प्रत्येक विषय के शिक्षण के साथ अध्यापक नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी दे सकते हैं। आत्मपरिष्कार की साधना के सूत्र विषय शिक्षण के साथ जोड़े जा सकते हैं। छात्रों के साथ सघन आत्मीयता, उनकी समस्याओं को भलीभाँति समझकर उनका समाधान प्रस्तुत कर उन्हें संतुष्ट करना, अनुशासनहीनता रोकने का प्रभावी उपाय है। प्रताड़ना और दंड की व्यवस्था से मनोवांछित कार्य तो कराया जा सकता है, लेकिन किसी को बदला नहीं जा सकता। शिक्षक का उच्चस्तरीय चरित्र, व्यक्तित्व एवं शिक्षण में ईमानदारी ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके द्वारा छात्रों को अपने अनुकूल ढालना आसान हो जाता है।

ज्ञानदान महान दान है। शिक्षक केवल छात्रों को ही नहीं, उनके अभिभावकों को भी ज्ञान के आलोक से आलोकित कर सकता है। छात्रों के माध्यम से शिक्षक अच्छी पुस्तकें उनके अभिभावकों तक समय-समय पर पहुँचाकर उन्हें भी स्वाध्याय परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते रहें।। इस प्रकार ज्ञान का आलोक घर-घर पहुँचाकर राजकीय सेवा के साथ-साथ महान पुण्य का भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता है।

शिक्षक छात्रों को पारिवारिक दायित्व का बोध कराएँ, समाजनिष्ठ बने रहने की प्रेरणा दें, पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध रखने की प्रेरणा दें, स्वार्थपरता की हानियाँ एवं परमार्थ में ही स्वार्थ के सूत्रों को हृदयंगम कराएँ, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का महत्त्व समझाएँ, विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला के सूत्रों का ज्ञान कराएँ । जिन कुरीतियों पर विजय पाना शासन, धर्माचार्य, पुलिस, अदालत एवं सामाजिक संगठनों के लिए असंभव है, उसे संभव बनाना शिक्षकों के लिए बड़ा आसान है। यदि वे अपने विषय के शिक्षण के साथ इन कुरीतियों से परिचित कराकर भविष्य में इनसे बचने की प्रेरणा दें तो उनका प्रभाव छात्रों के जीवन पर पड़ेगा। महान कार्यों के प्रतिफल के रूप समाज में सम्मान और आत्मसंतोष की उपलब्धियाँ अवश्य मिलती हैं। f जिन छात्रों का सुलेख अच्छा है, उनको दीवार लेखन की प्रेरणा देकर दीवारों पर प्रेरणाप्रद वाक्य लिखवाने चाहिए। इस प्रकार रास्ता चलते व्यक्तियों को सद्विचार देकर आप बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य करा सकते हैं। विद्यालयों में समय-समय पर उत्सव, जयंतियाँ, राष्ट्रीय पर्व मनाए जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि।

उनमें जो गीत गाए जाएँ वे राष्ट्रीयता, देशभक्ति से ओतप्रोत अपनी देश जाति के गौरव-गरिमा के अनुरूप हों तथा कविता सम्मेलन इत्यादि के द्वारा उनकी प्रतिभा को विकसित किया जा सकता है। शिक्षकों के पास एक बहुत बड़ी शक्ति है, उसे उन्हें समझना चाहिए। यदि प्यार और आत्मीयता के व्यवहार से उन्होंने छात्र वर्ग को अपनी बात मनवाने के लिए तैयार कर लिया तो समाज में कोई परिवर्तन कराना उनके लिए कठिन' नहीं होगा।

महापुरुषों के जीवन प्रत्यक्ष प्रकाश स्तंभ होते हैं। उनके अंदर कोई भी व्यक्ति झाँककर प्रकाश की किरण पा सकता है। उनकी सरलता जीवन जीने का सही शिक्षण -देती है।

एक बार एक पत्र- प्रतिनिधि गांधीजी से मिलने गया। उसे मालूम था कि गांधीजी शीशे की मदद के बिना भी शेव बना सकते थे, गांधीजी से उसने पूछा- "बापू ! आप • शीशे में मुँह क्यों नहीं देखते।" "मुझसे मिलने वाला हर व्यक्ति मेरा मुँह देखता ही " है।" गांधी जी ने जवाब दिया- "तो फिर मुझे खुद अपना मुँह देखने की क्या आवश्यकता है 


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने