Ctet 2022 विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से संम्बंध

 विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से संम्बंध ctet 2022

 विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से संम्बंध 
इस विषय के अंतर्गत आप निम्न उपविषयों से परिचत किये जाएंगे। 

  विकास की अवधारणा 
• वृद्धि एवं विकास में अंतर 
• मानव विकास की अवस्थाये 
•विकास के विभिन्न प्रकार (आयाम)  
• विकास का अधिगम से सम्बंध

विकास की अवधारणा : 

मानव में आयु के साथ होने वाले परिमाणात्मक परिवर्तनों के साथ ही गुणात्मक परिवर्तन भी होते रहते हैं। 'विकास' शब्द का अर्थ इसी प्रकार गुणात्मक परिवर्तनों से समझा जाना चाहिए। व्यक्ति में क्रमबद्ध रूप से होने वाले सुसंगत परिवर्तनों की क्रमिक श्रृंखला को 'विकास' कह सकते हैं। क्रमिक' होना, इस बात का संकेत करता है कि परिवर्तन एक दिशा में हो रहे हैं। यह दिशा-पीछे जाने के स्थान पर सदैव आगे की ओर उन्मुक्त रहती है। इसीलिए वह एक परिपक्वता को इंगित करती चलती है। क्रमबद्ध' तथा 'सुसंगत' होना इस बात को संकेतित करता है कि व्यक्ति के अंदर अब तक संघटित गुणात्मक परिवर्तन तथा उसमें आगे होने वाले परिवर्तनों में एक निश्चित संबंध है। आगे होने वाले परिवर्तन अब तक के परिवर्तनों की परिपक्वता पर निर्भर करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि व्यक्ति में गुणात्मक परिवर्तन अथवा परिपक्वता अचानक नहीं फूट पड़ती है। इसका क्रमिक सिलसिला बना रहता है। यही व्यक्ति का 'विकास' है। विकास के संदर्भ में होने वाले परिवर्तन, एक व्यक्ति में जन्म से लेकर मृत्यु तक होते रहते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि अपने विकास क्रम में, व्यक्ति जन्म से लेकर उत्तरोत्तर परिपक्वता को धारण करता जाता है।

वृद्धि एवं विकास में अंतर :


वृद्धि'

प्रायः वृद्धि' तथा 'विकास' शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के लिए अन्तर्बदल रूप में कर लिया जाता है। परंतु अवधारणा के स्तर पर ये परस्पर भिन्न हैं। वृद्धि' शब्द का प्रयोग व्यक्ति में होने वाले परिणात्मक परिवर्तनों को इंगित करता है। आयु बढ़ने के साथ आकार, लंबाई, भार और आंतरिक अंगों में होने वाले परिवर्तनों को, 'वृद्धि के अंतर्गत रखा जाना चाहिए। बालक जैसे जैसे बड़ा होता है उसका आकार, लंबाई, नाक-नक्श जैसे बचपन का मुटापा, बाल और दांत आदि में परिवर्तन आने लगता है। इसके स्थान पर नये नाक-नक्श आदि प्रकट होने लगते हैं। उसके पश्चात् आयु की ओर परिपक्वता आने पर नये दांतों का निकलना (दूध के दांत टूटते है) प्राथमिक तथा द्वैतीयक लैंगिंग विशेषताओं के प्रगट होने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इसी प्रकार पूरे व्यक्तित्व के सभी अंशों में परिवर्तन दिखलाई पड़ते हैं।
शैशवकाल और बाल्यकाल में बालक का शरीर क्रमिक रूप से आकार लंबाई और भार ग्रहण करता चलता है। 'वृद्धि शब्द का प्रयोग ऐसे ही परिवर्तनों को निर्दिष्ट करने के लिए समझना चाहिए। आयु के साथ सम्पूर्ण शरीर उसके विभिन्न अंगों आकार एवं भार में होने वाले परिवर्तन "वृद्धि में अंतर्निहित हैं। इस प्रकार वृद्धि शारीरिक क्षेत्र में होने वाली बढ़ोत्तरी को निर्देशित करती है। पर यह ध्यान रहे कि शरीर के विभिन्न अंगों में होने वाली वृद्धि की दर एक समान नहीं है। विभिन्न अंगों के बढ़ने की गति अलग-अलग होती है।

मानव विकास की अवस्थाये

मानव विकास को निम्न सात अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है।

1. शैशवकाल 
2. पूर्व बाल्य काल 
3. उत्तर बाल्य काल 
4. किशोरावस्था 
5. युवा प्रौढावस्था 
6. परिपक्क प्रौढावस्था
7. वृद्ध प्रौढावस्थ

मानव विकास के आयाम ( प्रकार ) :

 मानव विकास के आयाम को निम्न पांच प्रकार में विभाजित किया जा सकता है। 

1. शारीरिक विकास 
2. सामाजिक संवेगात्मक विकास 
3. नैतिक विकास 
4. संज्ञानात्मक विकास 
5. भाषिक विकास इन आयामों की पूर्ण जानकारी मानव विकास के आयाम पर प्राप्त करे।

विकास का अधिगम से संम्बंध:

यह सर्वविदित है कि बालक जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है तथा मृत्युपर्यन्त तक उसके सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है। जाने अनजाने में अपने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनुभवों के माध्यम से व्यक्ति सीखता रहता है तथा उसके आधार पर उसमें अपने परिवर्तन आते रहते हैं। अर्थात् सीखना एक बहुत ही सामाजिक व सहज प्रचलित प्रक्रिया है। गेट्स व अन्य के अनुसार अनुभव के द्वारा व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को सीखना या अधिगम कहते हैं। क्रो व क़ो के अनुसार सीखना आदतों, ज्ञान व अभिवृत्तियों का अर्जन है । इसस स्पष्ट होता है कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म से ही एक अधिगमयक होता है ।


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