जनवरी 2025 में धूमकेतु एटलस: विशेषताएँ एवं अवलोकन

 

जनवरी 2025 में धूमकेतु एटलस: विशेषताएँ एवं अवलोकन

जनवरी 2025 में, आकाशगंगा के समीप एक धूमकेतु एटलस (Atlas) दिखाई देगा। वैज्ञानिकों और आकाशीय अवलोकन प्रेमियों के बीच उत्साह का कारण इसकी अनूठी बनावट और गतिशीलता है।
विशेषताएँ:

  • आकार एवं चमक: धूमकेतु एटलस में बर्फ तथा धूल के कणों का मिश्रण होने के कारण इसकी उपस्थिति नाजुक, परन्तु समय-समय पर चमकदार दिखाई देती है।
  • कक्षा एवं पथ: यह धूमकेतु सूर्य के सापेक्ष एक विशिष्ट कक्षा में गति करता है, जिसके चलते इसका आकाश में पथ पूर्व से दक्षिण या उत्तर की ओर चलता हुआ प्रतीत होता है।

अवलोकन के समय एवं दिशा:

  • यदि मौसम साफ हो तथा अंधेरा आसमान उपलब्ध हो, तो इसे शाम के समय या गहन रात्री काल में देखा जा सकता है।
  • भौगोलिक अक्षांश के अनुसार दिन का मान बदलता है; अतः अपने क्षेत्र के अनुकूल, पूर्वोत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में इसके प्रकट होने की संभावना अधिक रहती है।
  • विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि धूमकेतु के दृष्टिगोचर होने का समय स्थानीय पूर्वानुमान एवं आकाशीय घटनाओं के आधार पर निर्धारित किया जाए।

ऋतु निर्धारण में भौगोलिक अक्षांश और सौर संक्रान्तियाँ

1. सौर संक्रान्तियाँ एवं ऋतुओं का आरम्भ

भारतीय वैदिक साहित्य तथा प्राचीन ज्योतिष शास्त्र में ऋतु चक्र का वर्णन विभिन्न दृष्टिकोणों से किया गया है। दो प्रमुख दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं:

  • वैदिक दृष्टिकोण:
    पंडित प. बाल गंगाधर तिलक, प. व्यंकटेश बापूजी केतकर, प. शंकर बालकृष्ण दीक्षित, एवं पं. दीनानाथ शास्त्री चुलेट जैसे विद्वानों के अनुसार, आर्यावर्त (पंजाब-हरियाणा से कश्मीर तक) में वसंत ऋतु का आरम्भ सायन मेष संक्रान्ति (21 मार्च) से माना जाता है। इसी आधार पर मधु-माधव मास का आरम्भ भी इसी तिथि से होता है।

    • तर्क: यदि पूर्णिमान्त मास या मध्य चैत्र मास में संवत्सर की शुरुआत करना उचित नहीं समझा जाता, तो वसंत ऋतु के मध्य से संवत्सर आरम्भ करना भी तार्किक रूप से अनुचित प्रतीत होता है। अतः वसंत से शरद तक की अवधि (21 मार्च से 23 सितम्बर) को उत्तरायण तथा शरद से वसंत तक की अवधि (23 सितम्बर से 21 मार्च) को दक्षिणायण माना जाता है।
  • पौराणिक एवं सिद्धान्त ज्योतिष दृष्टिकोण:
    पौराणिक काल में, विशेषकर कर्क रेखा के निकट स्थित उज्जैन को भारत का केंद्र मानते हुए, वसंत ऋतु का आरम्भ सायन मीन संक्रान्ति (18 फरवरी) से बताया गया है। इसी तर्क से मधुमास की अवधि और वर्ष के आरम्भ की गणना की जाती है।

    • तर्क: इस प्रणाली में दिन और रात के अनुपात, अक्षांशीय भिन्नता तथा मौसमी परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए गणनाएँ की जाती हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायण की अवधियों का निर्धारण, सौर गतियों के आधार पर, क्रमशः मकर और कर्क संक्रान्तियों से किया जाता है।

2. भौगोलिक अक्षांश एवं ऋतु परिवर्तन

ऋतुओं के आविर्भाव में केवल सौर संक्रान्तियाँ ही नहीं, बल्कि भौगोलिक अक्षांश का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

  • भूमध्य रेखा पर: यहाँ शिशिर (ठंड) का अनुभव नहीं किया जाता, क्योंकि दिन-रात का अंतर अत्यल्प होता है।
  • ध्रुवों पर: ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) का अनुभव नहीं होता क्योंकि सूर्य की किरणें यहाँ कम तिव्रता से पड़ती हैं।
  • मानसून क्षेत्रों में: वर्षा ऋतु केवल इन क्षेत्रों में ही होती है, और इसके आगमन का समय भी क्षेत्रवार भिन्न होता है।
  • अर्धगोलों के अनुसार: उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में ऋतु परिवर्तन विपरीत दिशाओं में होते हैं, अतः एक ही समय पर दोनों गोलार्धों में अलग-अलग ऋतुओं का अनुभव होता है।

3. देश-काल एवं समय की अवधारणा

ऋतु और संवत्सर आरम्भ की परिभाषा में 'देश' (भौगोलिक स्थिति) एवं 'काल' (सामयिक परिवर्तन) दोनों का महत्त्व है।

  • उदाहरण के तौर पर, वैदिक ग्रन्थों में वर्णित ऋतु चक्र आर्यावर्त के अनुकूल है, जबकि उज्जैन को केंद्र मानकर की गई पौराणिक गणनाएँ अन्य क्षेत्रों पर लागू नहीं की जा सकतीं।
  • इस प्रकार, समय और ऋतु के आरम्भ के लिए किसी एक सिद्धांत का पूर्णतः समर्थन या खण्डन करना कठिन है क्योंकि दोनों ही प्रणाली अपने-अपने भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों में सत्य हैं।

निष्कर्ष

धूमकेतु एटलस जनवरी 2025 में एक आकर्षक खगोलीय घटना के रूप में उभरकर आएगा, जिसे क्षेत्र विशेष में सही समय, दिशा एवं मौसम के अनुसार देखा जा सकता है।
साथ ही, ऋतु निर्धारण में न केवल सौर संक्रान्तियों का, बल्कि भौगोलिक अक्षांश एवं सांस्कृतिक परंपराओं का भी योगदान है। वैदिक और पौराणिक दोनों प्रणालियाँ अपने-अपने क्षेत्र में प्रासंगिक हैं और इनका मिलाजुला अध्ययन हमें एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है।

यह विविधतापूर्ण दृष्टिकोण न केवल प्राचीन विद्वानों की सूक्ष्मता को दर्शाता है, बल्कि आधुनिक खगोलशास्त्र और सांस्कृतिक धरोहर के बीच के संबंध को भी उजागर करता है।

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