कोई भी सभ्यता जब पुरानी होती है, तो उसमें बहुत सारी विसंगतियाँ, विकृतियाँ भी परंपरा का अंग बनने लगती हैं। जागरूक समाज वही है जो इन विकृतियों को दूर करने के बारे में सदा सतर्क रहे और समुचित उपाय खोजता रहे।
आज अपने भारतीय समाज में नारी के आदर्श स्वरूप के बारे में भी अनेक विकृत भ्रांत मान्यताएँ घर कर गई हैं। उनमें आवश्यक सुधार अपेक्षित है। यह तो सर्वविदित है कि जब हम उन्नति के शिखर पर थे, तब अपने समाज में नारियाँ भी समान रूप से स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी होती थीं। सामाजिक चेतना, दार्शनिक प्रखरता, प्रशासनिक दक्षता, आध्यात्मिक उत्कृष्टता, राजनयिक परिपक्वता आदि का भी उनमें प्राचुर्य था, किंतु मध्ययुगीन पतनकाल में, जब पुरुष की प्रधानता की परिकल्पना रूढ़ होने लगी, उन दिनों नारी के व्यक्तित्व के आदर्श भी संकीर्ण होने लगे। उसके व्यक्तित्व को विधिवत कुंठित किया जाने लगा।
उसी अवधि में भारतीय नारी को भी आदर्श के नाम पर संकीर्णता और सहिष्णुता के नाम पर कायरता सिखाई गई। अब एक विकासशील समाज में इन मान्यताओं को बदलना तथा युगीन मान्यताएँ प्रचारित करना आवश्यक है।
भारतीय नारी को प्रेम, समर्पण, त्याग की सही परिभाषाओं से अवगत कराया जाना चाहिए। यह समझा जाना चाहिए कि स्त्रियों के भी आत्मा होती है। और उनकी आत्मिक आवश्यकताएँ पुरुषों के ही समान महत्त्वपूर्ण हैं। आत्मिक आवश्यकता सदैव चेतनात्मक विकास द्वारा पूरी होती है, न कि भौतिक सुख-साधनों के विकास द्वारा। इसीलिए नारी को भोजन, वस्त्र, आवास की व्यवस्था जुटा देने भर से उसकी आत्मिक आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती । उसमें सामाजिक चेतना और आध्यात्मिक जाग्रति भी विकसित की जानी चाहिए। नारी को सुख और श्रेष्ठता की सही धारणाओं से अवगत कराया जाना चाहिए। उनके मानसिक क्षितिज को विस्तृत होने देना चाहिए। उनकी प्रेमवृत्ति में और अधिक विशालता, उनकी त्याग-बुद्धि में संतुलित जागरूकता तथा उनकी आदर्श चेतना में व्यापकता को आवश्यकता है। यह आदर्श अब पूरी तरह अस्वीकार किया जाना चाहिए कि पति की या परिवार की मूक सेविका बनकर रहने में उनका कोई गौरव है अथवा परिवार को सुव्यवस्था तक ही उन्हें अपना ध्यान सीमित रखना चाहिए, सामाजिक सुव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था के प्रति उन्हें उदासीन ही रहना चाहिए। ये भ्रांत आदर्श हैं।
नारी का कर्त्तव्य अपने परिवार की हर भली- बुरी प्रवृत्ति का अनुमोदन करना नहीं है। वह समाज की एक सदस्य होने के कारण ही परिवार की सदस्य है। समाज से भिन्न किसी भी परिवार का अस्तित्व असंभव है। अतः नारी को परिवार के साथ ही समाज के प्रति भी अपने कर्तव्य सदैव याद रखने की प्रेरणा दी जानी चाहिए। पति कितना भी दुष्ट हो, दुर्जन हो, परिवार में कितनी भी विकृत मान्यताएँ घुसी पड़ी हों तो भी मूक समर्पण के भाव से नारी पति और परिवार की हर अच्छी-बुरी आवश्यकता पूरी करने का प्रयास करे, ऐसी पौराणिक परिकल्पना एवं सामंती मान्यता अब छोड़ी जानी चाहिए। पति की इच्छा ही मेरी इच्छा है, यह आदर्श अस्वीकार करना होगा और पति का कल्याण ही मेरा कल्याण है, इस आदर्श को अपनाना होगा। पति यदि अकल्याण, अनौचित्य, अधःपतन के मार्ग पर प्रवृत्त है तो उसके समर्थन में नहीं, वर्जन में ही नारी की गरिमा है। इसी प्रकार पति और बाल-बच्चे, कहीं आसमान से टपककर उसे नहीं मिले हैं, वे इसी समाज और संसार के अंग हैं, समाज से बाहर उनकी स्थिति नहीं है, यह जागरूक नारी को समझना होगा। मैं सुखी हूँ मेरा पति पर्याप्त रुपये कमाता है। बाल-बच्चों के पास खिलौनों-कपड़ों-किताबों की- कमी नहीं। घर में आधुनिक सुख-सुविधा-साधनों का अभाव नहीं। बस इतने में ही नारी को प्रसन्न, कृतार्थ नहीं अनुभव करना चाहिए। उसे यह भी जानना चाहिए कि ये रुपये अनोति की कमाई से तो नहीं ? पति हमें जो सुख-सुविधाएँ जुटा रहा है, वे समाज के औसत स्तर से इतनी अधिक तो नहीं कि समाज के अन्य सदस्यों में ईर्ष्या और घृणा का कारण बनें। घूसखोरी, बेईमानी की कमाई तो घर में नहीं आ रही है। विदेशी माल के तस्कर व्यापार में तो हम सहयोगी नहीं हैं, चोरी-छिपे विदेश से लाई गई चीजें तो नहीं खरीदते ?
भारतीय स्त्रियों स्वभाव से ही धार्मिक होती हैं। उन्हें धार्मिकता को विस्तृत अर्थ में समझने के अवसर दिए जाने चाहिए। उन्हें यह समझने देना चाहिए कि यदि उनको गृहस्थी पाप के ऊपर चल रही है तो उनका पूजा-पाठ, त्याग बलिदान सब व्यर्थ है। यदि उनका साहूकार पति हजारों गरीबों को स्ला-रुलाकर उन्हें सोने-मोती से सजाता है, यदि उनका वकील पति समाज में झगड़ों को और अधिक बढ़ाकर कमाई करता है, यदि डॉक्टर पति गरीब भाई-बहनों से अनुचित रीति से रुपये वसूल करता है, तो फिर उनकी हँसती-मुस्कराती गृहस्थी भी पाप की भट्ठी के ऊपर खड़ी है, नरक के द्वार की ओर बढ़ रही है, उनका दान, धर्म, छल एवं पाखंड मात्र हैं। इसी प्रकार नारियों को यह भी समझना होगा कि दान- धर्म, पुण्यकर्म के नाम पर वे जो कुछ देतो-करती हैं, उससे समाज में आलस्य, दंभ, याप और व्यभिचार तो नहीं बढ़ रहा है, आलसी, कामचोर लोगों का मुफ्तखोरों और धोखेबाजों का समूह तो उनके दान- पुण्य के धन से नहीं पलता, यह सब जानना ही चाहिए। जाग्रता नारी को यह स्पष्ट दीखना चाहिए कि अनौचित्य की कमाई से बने आभूषण अँगार की तरह हैं, महँगे कपड़े खून के दाग से सने हैं, ऊँचे भवन की बुनियाद में लोगों के कंकाल हैं, कराहें हैं. असीमित सुख-साधनों के भीतर नैतिक गिरावट की प्रेरणाएँ हैं । यह सामाजिक चेतना यदि नारियों में आ जाए, तो वे पति और परिवार के वास्तविक कल्याण का उपाय सोचेंगी। इसी कल्याण भावना से तो वे न जाने कितने नियम निभाती हैं, व्रत-उपवास करती हैं, स्नान-ध्यान, दान-पुण्य करती हैं। आवश्यकता कल्याण के सच्चे स्वरूप को समझने की है।
नारी को संकीर्ण बनाकर पूरे समाज ने पाया कुछ नहीं, खोया ही खोया है। भारतीय नारी तो स्वभावतः ध्येयनिष्ठ है। उसे जीवन के जो ध्येय समझा दिए गए, उन्हीं में वह रँगती चली गई। जिन ध्येयों का उन्हें शिक्षण दिया गया, उनका निर्वाह उन्होंने पूरी तत्परता से किया। अब उनके ध्येय संकीर्ण नहीं, विशाल होने चाहिए। उनकी संवेदना का दायरा परिवार तक सिमटकर नहीं रहना चाहिए। पूरे समाज के संदर्भ में ही अपने परिवार को देखना उन्हें आना चाहिए। सामाजिक चेतना से संपन्न नारी ही स्वयं का, परिवार का तथा समाज का कल्याण करेगी वही अनुकरणीय आदर्श है।
किसी भक्त ने महर्षि रमण से पूछा- "अनेक लोग देश सेवा के अनेकानेक कार्यों में लगे हैं, तब आप क्यों निष्क्रिय बैठे रहते हैं ?" महर्षि ने सहज उत्तर दिया- "चक्की का निचला पाट स्थिर रहता है और ऊपर वाला घूमता रहता है, तभी आटा पिसता है। दोनों घूमें तो बात बनेगी नहीं, गड़बड़ी फैलेगी। किसी को चिंतन करने और प्रकाश देने के लिए स्थिर भी तो बैठना चाहिए। उन्होंने और भी कहा- "मकान बनता है, तब राज, मजदूर ईंटें ढोते और तोड़ते हैं। आवाज होती है, पर जब रँगाई-पुताई का काम चलता है तो वहाँ कुछ भी शोर-शरा नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं है कि रंगाई-पुताई करने वाले निष्क्रिय बैठे हैं।"
