शिक्षण तथा अधिगम में शिक्षण सामग्री का महत्व

 शिक्षण तथा अधिगम में सम्बन्ध

 शिक्षण का अर्थ- शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण सबसे प्रमुख हैं। शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया हैं। शिक्षण शब्द शिक्षा से बना हैं जिसका अर्थ हैं। शिक्षा प्रदान करना। शिक्षण की प्रक्रिया मानव व्यवहार को परिवर्तित करने की तकनीक हैं अर्थात् शिक्षण का उद्देश्य व्यवहार परिवर्तन हैं।




 शिक्षण का संकुचित अर्थ संकुचित अर्थ में शिक्षण का तात्पर्य बालक को कक्षा में निश्चित समय निश्चित विधियों, निश्चित - स्थान पर पूर्वनियोजित ढंग से शिक्षण दिया जाता है 

इस प्रक्रिया में शिक्षक का स्थान प्रमुख तथा बालक का स्थान गौण हो जाता है। शिक्षण का व्यापक अर्थ वस्तुतः शिक्षण मनुष्य के जीवन में निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है उसे अपने पर्यावरण से किसी न किसी रूप में शिक्षण प्राप्त होता रहता है। 

शिक्षण एक द्विमुखी प्रक्रिया 'एडम्स' ने शिक्षा को एक द्विमुखी प्रक्रिया माना है इस प्रक्रिया में शिक्षक का स्थान प्रमुख तथा शिक्षार्थी का स्थान गौण हैं अर्थात् शिक्षण शिक्षक केन्द्रित हो गया। शिक्षण एक त्रिमुखी प्रक्रिया जान डीवी के अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया त्रिमुखी हैं रॉयबर्न ने भी शिक्षण की प्रक्रिया को त्रिमुखी बताया है।

 रायबर्न के अनुसार " शिक्षा में तीन केन्द्र बिन्दु हैं शिक्षक, शिक्षार्थी और विषयवस्तु 'शिक्षण' इन तीनो में स्थापित किया जाने वाला सम्बन्ध हैं। 

शिक्षण एवं अध्ययन

शिक्षण की विशेषताएं 

1. यह सुनियोजित होता है एवं इसका अध्ययन व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप में किया जाता है।

 2. यह सोद्देश्य एवं द्विपक्षीय होता हैं। 

3. प्रोत्साहन देने वाला एवं प्रजातांत्रिक होता हैं। 

4. संवोगात्मक स्थिरता प्रदान करने वाला होता है।

 5. सहाय की मनोशारीरिक क्षमताओं के अनुरूप होता है।

 6. अच्छा शिक्षण पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने वाला होता है। 7. यह निदानात्मक एवं उपचारात्मक होता है। 

8. यह पूर्व ज्ञान पर आधारित होता है।

 9. अच्छे शिक्षण में अध्यापक, एक मित्र, दार्शनिक तथा पथप्रदर्शक के रूप में तथा छात्र अध्ययन-अध्यापन क्रिया के सक्रिय कार्यकत्र्ता के रूप में कार्य करता है।

 10. जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान करने में सहायक होता है। 

11. इसमें अध्यापक का कक्षा व्यवहार प्रत्यक्ष की अपेक्षा अप्रत्यक्ष अधिक होता है। 

12. इसमें जनतन्त्रात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता है।

 13. अच्छा शिक्षण छात्रों में सृजनात्मकता का विकास करता है। 14. यह सीखने के प्रति रोचकता व प्रभावोत्पादकता प्रदान करता है।

 15. यह सुझावात्मक होता हैं। 

16. यह ज्ञान का मूल्याकन करता है। 

17. यह छात्रों में आत्मविश्वास उत्पन्न करता है।

 18. छात्रों के सर्वागीण विकास पर बल देता हैं। 

19. इसमें छात्रों की क्रियाओं को समुचित पुनर्बलित किया जाता है। 20. अच्छा शिक्षण शिक्षक शिक्षार्थी के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करता है।


शिक्षण तथा अधिगम में सम्बन्ध 

प्राणी जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त नये-नये अनुभव प्राप्त करता रहता है तथा इन अनुभवों के अपने व्यवहारों को वह सुधारता रहता है उदाहरण के लिए छोटा बच्चा किसी गर्म वस्तु को पकड़ने से जलन का अनुभव करता है यह उसके लिए एक अनुभव है आगे वह गर्म चीजों नहीं पकड़ेगा या सावधानी से पकड़ेगा। गर्म चीज को पकड़ने के सम्बन्ध में उसके व्यवहारों में जो परिवर्तन हुआ है वही अधिगम कहलाता है इस दृष्टिकोण से हम अनुभवों से लाभ उठाने को अधिगम कह सकते हैं। व्यवहारों में सुधार को लेकर यदि अधिगम की परिभाषा करे तो हम कह सकते हैं कि व्यवहारों का परिमार्जन ही अधिगम है" • शिक्षण तथा अधिगम में घनिष्ठ सम्बन्ध है। वैसे यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक शिक्षण से अधिगम हो ही किन्तु इतना निश्चित है कि प्रत्येक शिक्षण का मूल एवं एकमात्र अन्तिम उद्देश्य अधिगम होता है उद्देश्य की दृष्टि से देखे तो कह सकते है कि शिक्षण साधन है एवं अधिगम साध्य हैं। एक प्रक्रिया हैं तो दूसरा उसका परिणाम हैं। इस प्रकार शिक्षण एवं अधिगम एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। कक्षा के छात्रों का जो पूर्व अधिगम होता है उसी को आधार बनाकर अपने शिक्षण का आयोजन करता है छात्रों के पूर्व अनुभवों की जैसी स्थिति तथा अवस्था होगी शिक्षण का स्तर तथा गति तदनुसार ही करनी होगी। इतना ही नहीं शिक्षक को उसी के अनुरूप शिक्षण प्रविधिया तथा नीतियाँ प्रयोग करनी होगी। शिक्षण सिद्धान्तों का विकास अधिगम सिद्धान्तों के आधार पर होता है शिक्षण तथा अधिगम के इन सिद्धान्तों मध्य परस्पर आधार के कारण भी शिक्षण तथा अधिगम में सम्बन्ध बढ़ जाते हैं। वास्तव में शिक्षण अधिगम परिस्थितियों का व्यवस्थीकरण हैं। ● शिक्षण तथा अधिगम का आधार शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षण तथा अधिगम दोनो ही अपने अपने सिद्धान्तों व निरुपण मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर करते हैं। मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण ही शिक्षण तथ अधिगम में परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट होता है।

उपरोक्त विवेचन से शिक्षण तथा अति के मध्य सपष्ट होता है। इन दोनों के मध्य इतने प्रगाढ़ सम्बन्ध होते हुए भी दोनो में कुछ आधारभूत अन्तर हैं- 

1. अधिगम का क्षेत्र व्यापक है जब कि शिक्षण में इतनी व्यापकता नहीं है। 

2. शिक्षण ही अधिगम का एकमात्र साधन नहीं है। प्राणी शिक्षण के अलावा अपने अनुभव, ज्ञानेन्द्रियों, अनुकरण, अन्तदृष्टि आदि से भी अधिगम प्राप्त करता है। 

3. शिक्षण प्रणाली व्यक्तित्व के केवल एक अंश को ही प्रभावित करती है जबकि अधिगम का प्रभाव सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ता है। 

4. शिक्षण सदैव औपचारिक होता हैं जबकि अधिगम औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों ही प्रकार का होता हैं।

 5. शिक्षण एक कार्य व्यवस्था है तो अधिगम उसका परिणाम है। शिक्षण एक सामाजिक कार्य हैं जबकि अधिगम व्यक्तिगत कार्य है।

 6. शिक्षण कार्य परक प्रक्रिया है। जबकि अधिगम निष्पतिपरक प्रक्रिया है। 

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का शिक्षा में योगदान 

1. यह नवीन अधिगम पर बल देती है 

2. शिक्षा को दविमुखी प्रक्रिया की अन्तः क्रिया के रूप में स्वीकार करती है। 

3. शिक्षण के अनेक प्रारूप विकसित हुए हैं। 

4. बालकों के गुणो का अधिगम में उपयोग किया जाता है।

 5. अनेक नवीन प्रत्ययों का विकास इसके द्वारा होता है। 

6 सीखने के दिशाव मे भी परिवर्तन आया है अधिगम परिवर्तन ध्यान दिए जाने लगा हैं 

7. अनेक प्रकार के शैक्षिक अविष्कार हुए हैं। 

8. अभिप्रेरणा की आन्तरिक रचना, योग्यता तथा उद्दीपन में भी अन्तर आया है।

 9. अधिगम की विभिन्न शैलिया विकसित हुई है।

10 शैक्षिक लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाने लगा है। 

11. सार्थक अधिगम पर बल दिया जाने लगा है।



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