वातावरण व इसका विकास पर प्रभाव
वास्तव में मानव व्यक्तित्व दो प्रभावी तत्वों वंशानुक्रम व वातावरण की देन है। कोल तथा ब्रूस के अनुसार जीव गर्भधारण के समय से ही वंशानुगत क्षमता के अनुसार ही संवेदनशील, सक्रिय रहने वाला, प्रभावी व्यक्तिक के रूप में विकसित होता है। इस विकास के साथ यह शर्त भी है के उसका वातावरण इसके विकास के लिए आवश्यकतानुसार साधन तथा उद्दीपन का प्रावधान करे।
वातावरण का अर्थ:-
वातावरण के लिये पर्यावरण शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है परि+आवरण। परि का अर्थ है चारों और एवं आवरण का अर्थ है ढकने वाला इस प्रकार पर्यावरण या वातावरण वह वस्तु है जो चारों और से ढ़के या घेरे हुए है। अतः व्यक्ति के चारों और जो कुछ है वह उसका वातावरण है। इसमें वे सब तत्व सम्मिलित किये जा सकते है जो व्यक्ति के जीवन और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। वुडवर्थ के अनुसार "वातावरण में वह सब बाह्य तत्व आ जाते है जिन्होंने व्यक्ति को जीवन प्रारंभ करने के समय से प्रभावित किया है।" रास के अनुसार " वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।" अतः वातावरण व्यक्ति को प्रभावित करता है। इसमें बाहय तत्व आते है। वातावरण किसी एक तत्व का नाम नहीं अपितु एक समूह तत्व का नाम है। इस दृष्टि से वातावरण व्यक्ति को उसके विकास में वांछित सहायता प्रदान करता है।
वातावरण का महत्व:-
1. बालक अपना अधिकाश समय अपने परिवार, पड़ोस, मोहल्ले तथा खेल के मैदान में व्यतीत करता है जिससे उसके विकास पर इनका प्रभाव पड़ता है। इन स्थानों के वातावरण का ज्ञान होने पर बालक को उचित निर्देशन देकर उसके विकास को सही दिशा प्रदान की जा सकती है। इसके साथ ही विकास संबंधी समस्याओं का समाधान भी किया जा सकता है।
2. वातावरण संबंधी ज्ञान बालक की कुसमायोजन संबंधी समस्याओं को सुलझाने में सहायक होता है। यदि कोई बालक दूषित वातावरण से आता है तो उसकी उपेक्षा न करके ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे उस वातावरण का प्रभाव कम हो सके और बालक के व्यवहार में सुधार हो सके।
3. वातावरण से संबंधित परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि बालक के व्यवहार पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। इसका ज्ञान होने के कारण ही विद्यालय में अनुकूल शैक्षिक वातावरण बनाने का प्रयत्न किया जाता है। इस सबके लिए पुस्तकालय, खेल कूद, व्यायाम के साथ ही अन्य पाठ्य सहगामी क्रियाओं का आयोजन किया जाता है। इस प्रकार की क्रियाओं से परिपूर्ण वातावरण का प्रभाव बालक की भावनाओं पर व्यापक रूप से पड़ता है। परिणामतः चरित्र निर्माण में वातावरण काफी सहायक होता है।
4. न्यूमैन तथा फ्रीमैन ने जुड़वां बच्चों पर अध्ययन करके यह सिद्ध कर दिया है कि शैक्षिक उपलब्धियां, व्यक्तित्व और स्वभाव पस्चातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। न्यूमैन के अनुसार "वातावरण द्वारा शारीरिक लक्क्षण प्रभावित होता हैं बुद्धि उससे अधिक, शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्ति उससे भी अधिक तथा व्यक्तित्व एवं स्वभाव सबसे अधिक।" इस ज्ञान के फलस्वरूप शिक्षक, कक्षा के वातावरण को अनुकूल बनाने का प्रयत्न कर सकता
5. बालक के विकास की दिशा को वातावरण निश्चित करता है। अनुकूल वातावरण मिलने पर बालक सदाचारी और चरित्रवान बनता है तथा प्रतिकूल वातावरण मिलने पर वह दुराचारी और चरित्रहीन हो सकता है। इस बात का ज्ञान होने से अभिभावक विद्यालय से बाहर के वातावरण और शिक्षक विद्यालयीय वातावरण को नियंत्रित कर अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते हैं जिससे बालक का सही दिशा में विकास हो सके।
6. शिक्षा, बालक की अन्तनिहित शक्तियों का विकास करती है। इन अन्तर्निहित शक्तियों का स्वाभविक विकास उपयुक्त वातावरण में ही हो सकता है। बालक की मूलप्रवृत्तिया उसे वंशानुक्रम से प्राप्त होती है, किन्तु उसका विकास उपयुक्त वातावरण में ही होता है।
7. प्रत्येक समाज का एक विशिष्ट वातावरण होता है। बालक को सामाजिक वातावरण से ही अनुकूलन करना पड़ता है। इस बात से पूर्ण परिचित शिक्षक, विद्यालय को लघु समाज का रूप प्रदान कर बालकों को उनके सामाजिक वातावरण से अनुकूलन करने की शिक्षा प्रदान कर सकता है।
8. वातावरण के महत्व से परिचित शिक्षक ऐसा वातावरण तैयार कर सकता है जिससे बालकों में विचारों की उचित अभिव्यक्ति, शिष्ट सामाजिक व्यवहार, कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान, स्वाभविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण आदि गुणों का अधिक से अधिक विकास हो सके।
