शिक्षण कौशल ( Teaching Skill) ctet 2022
शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक को अनेक कार्य एक साथ करने पड़ते हैं जैसे लिखना, प्रश्न पूछना, स्पष्ट करना, प्रदर्शन करना आदि इसलिये इसे क्रियाओं का सकुल कहा जाता है। अध्यापक का कार्य विद्यार्थी को इन क्रियाओं में संलग्न करना है। यह शिक्षण कौशल काफी तकनीकी युक्त और परिश्रमपूर्ण होते हैं। इन शिक्षण कौशलों की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। इनमें निहित शिक्षण व्यवहारों में भी काफी अन्तर पाया जाता है और इसलिए उन सभी का अभ्यास और उन्हें विकसित करने की प्रक्रिया में अन्तर पाया जाना स्वाभाविक ही हैं। वास्तव में शिक्षण कौशलों द्वारा शिक्षक के व्यवहार प्रदर्शित होते है। शिक्षक की सभी क्रियाएँ विद्यार्थियों के अधिगम की ओर केन्द्रित रहती हैं। शिक्षक की इन क्रियाओं में कभी व्याख्यान देना, कभी उदाहरण प्रस्तुत करना, कभी विशिष्ट शब्दों की व्याख्या करना तथा कभी कक्षा में कुछ करके दिखाना आदि सम्मिलित होता है। शिक्षण प्रक्रिया में प्रयुक्त होने वाली इस प्रकार की सभी क्रियाएँ ही शिक्षण कौशल कहलाती हैं। यही विभिन्न शिक्षण क्रियाओं की सफलता ही शिक्षण कला बन जाती हैं। संक्षेप में शिक्षण कौशल शिक्षक के व्यवहारों का एक समूह होता है जो विद्यार्थियों के अधिगम में किसी न किसी रुप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में सहायता करता है।
श्री वी० के० पासी ने शिक्षण कौशल शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया हैं:- "शिक्षण कौशल उन परस्पर सम्बन्धित शिक्षण क्रियाओं या व्यवहारों का समूह हैं जो विद्यार्थी के अधिगम में सहायता देते हैं।" एन० एल० गेज के अनुसार, "शिक्षण कौशल वे अनुदेशनात्मक क्रियाएँ और विधियाँ है जिनका प्रयोग शिक्षक अपनी कक्षा में कर सकता है। ये शिक्षण के विभिन्न स्तरों से सम्बन्धित होती है या शिक्षक की निरन्तर निष्पति के रूप में होती हैं।
" शैक्षिक शब्दकोष के अनुसार, "कौशल मानसिक शारीरिक क्रियाओं की क्रमबद्ध और समन्वित प्रणाली होता हैं। "
अतः शिक्षण कौशल मुख्यतया कक्षा में अन्तक्रिया जैसी परिस्थिति उत्पन्न करने में, अधिगम में, विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति में तथा शिक्षण क्रियाओं के विशिष्टीकरण में सहायक होते हैं। ये सभी शिक्षण कौशलों की विशेषताएँ है। सामाजिक अध्ययन को पढ़ाने के लिये कुछ शिक्षण कोशलों की अति अधिक आवश्यकता होती है। यदि प्रशिक्षण कार्यक्रम में विधिवत् सूक्ष्म शिक्षण पाठों का आयोजन किया जाए तो अध्यापक उचित अभ्यास के माध्यम से कुशल अध्यापक बनकर वांछित सफलता प्राप्त कर सकते है।
मानचित्र अध्ययन कौशल सम्प्रत्य ( Concept of Skill of Map Reading)
मानचित्र में सदैव पृथ्वी के उस रूप का प्रतिदर्शन किया जाता है जो उसको ऊपर से देखने में प्रतीत होता है। ऊपर से देखने पर प्रत्येक वस्तु चपटी अर्थात् केवल उसकी लम्बाई और चौड़ाई ही दिखाई देती है। यही कारण है कि मानचित्र में मकान पेड़ तथा पर्वत इत्यादि की केवल लम्बाई और चौड़ाई ही दिखाई जाती है। इन वस्तुओं का तीसरा नाप उचाई मानचित्र में प्रकट नहीं किया जाता है। दूसरा प्रश्न यह है कि पृथ्वी पर या उसके किसी एक भाग में हमे अनेको वस्तुएं जैसे पर्वत पठार नदी या नगर इत्यादि दिखाई पड़ते हैं। इन सबको समतल कागज पर किस प्रकार प्रकट किया जा सकता है? इसको प्रकट करने के लिए मानचित्र में अनेको चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, जो सर्वमान्य है। नदी नगर रेल सड़क तथा पुल इत्यादि प्रत्येक वस्तु के लिए कुछ परम्परागत चिन्ह है। मानचित्र में केवल इन परम्परागत चिन्हों का ही प्रयोग किया जा सकता है, अन्य का नहीं इसलिये मानचित्र की ठीक परिभाषा इस प्रकार है "यह पानी या उसके विशेष भाग के ऊपर से दिखाई देने वाले रूप का एक समतल कागज अथवा धरातल पर उसी अनुपात में वह प्रतिदर्शन है जिसमें कुछ परम्परागत चिन्हों का प्रयोग किया गया हो।" मानचित्रप्रतिदर्शनाविक के क्षेत्र से एक विशेष अनुपात होता है या अन्य शब्दों में मानचित्र उस भाग के वास्तविक क्षेत्र का केवल एक छोटा सा भिन्न होता है। इस भिन्न या अनुपात को मापक कहते हैं। मानचित्र पर मापक का होना नितांत आवश्यक है। मानचित्र पर मापक के होने का अर्थ है कि उस पर अक्षांश तथा देशान्तर रेखाएं किसी विशेष प्रक्षेष के अनुसार खींची गई है। इसलिए कोई भी मानचित्र बिना प्रक्षेप की सहायता के नहीं खींचा जा सकता। मानचित्रों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी का मुख्य आधार किसी क्षेत्र की विशेष बातों को प्रकट करने से है। भिन्न भिन्न कार्यों के लिए भिन्न भिन्न मानचित्रों का प्रयोग किया जाता है, जिससे गलती की सम्भावना न रहे। दूसरी श्रेणी में मानचित्रों का विभाजन उनमें प्रयोग किये गये मापक के अनुसार होता है। कल्पना कीजिए यदि विद्यार्थियों को भारत के क्षेत्र के विस्तार की जानकारी देनी हो तो उन्हें कैसे समझाया जाये। यह जानकारी केवल मानचित्र के आधार पर ही दी जा सकती है। लेकिन यह जानकारी देने के लिए मानचित्र का अध्ययन कैसे किया जाए। यह जानना भी आवश्यक है। मानचित्र को निम्नलिखित प्रकार अध्ययन किया जाता है -
1. दिशाओं का प्रयोग करके (Using directions)
मानचित्र दिशा का ज्ञान कराते हैं। ग्लोब को पृथ्वी का मॉडल कहा जाता है। इसमें रेखाओं का जाल बना हुआ है के जिसके उत्तर तथा दक्षिण में ध्रुव है और काल्पनिक रेखाएं है। इसमें भूमध्य रेखा, कर्क तथा मकर रेखा बनी है। इस पर बने चित्र से हम पृथ्वी के छोटे से छोटे प्रदेश की जानकारी प्राप्त कर सकते है। यह रेखाए समय दिशा की भी जानकारी देती है। मध्याह रेखाएं उत्तर तथा दक्षिण दिशा की जानकारी देती है। उत्तर सदैव उत्तर यु तथा दक्षिण सदैव दक्षिण ध्रुव की तरफ रहता है। इस जानकारी के आधार पर विद्यार्थी दिशाओं की जानकारी ग्लोब पर बने मानचित्र के आधार पर देते हैं।
2. दूरी की जानकारी देकर (Using Distance)
मानचित्र पर मापक का प्रयोग करके मानचित्र से सम्बन्धित जानकारी दी जा सकती है।
(i) साधारण कथन द्वारा:-
उदाहरणार्थ एक सेंटीमीटर बराबर है दो किलोमीटर। इसका तात्पर्य यह है कि मानचित्र पर यदि दो स्थानों की दूरी एक सेंटीमीटर है तो वास्तविक क्षेत्र में उन्हीं स्थानों के बीच की दूरी दो किलोमीटर होगी।
(ii) अनुपात अथवा प्रदर्शक भिन्न:-
बहुधा मानचित्रों में मापक को प्रकट करने के लिए निम्न का प्रयोग किया जाता है। इस भिन्न में अंश सदेव एक होता है, इसके द्वारा मानचित्र की लम्बाई प्रकट की जाती है। इस भिन्न के द्वारा वास्तविक क्षेत्र की लम्बाई प्रकट की जाती है। इस प्रकार यदि मानचित्र पर भिन्न 1/100,000 दी हुई है जिसको कभी कभी 01:100,000 भी लिखा जाता है तो इसका तात्पर्य है कि मानचित्र पर एक सेन्टीमीटर पानी पर 100,000 सेंटीमीटर अथवा किलोमीटर को प्रकट करता है। इस भिन्न को प्रदर्शक भिन्न कहते हैं। इसलिए प्रदर्शक भिन्न मानचित्र की दूरी/पच्ची की दूरी इस प्रकार मापक को प्रदर्शक भिन्न द्वारा प्रकट करने में एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसको नाथ की किसी इकाई में परिणत किया जा सकता है।
(iii) चित्र द्वारा
शीघ्रता से पढ़ने के लिए उसका चित्र द्वारा प्रदर्शन किया जाता है। मानचित्र के नीचे के नाम में एक साधारण सीधी रेखा खींच दी जाती है। इसको सुविधानुसार अन्य छोटे छोटे भागों में उसी अनुपात में बांट दिया जाता है जो अनुपात मानचित्र पर पथ्वी के साथ होता है।
3. रंगों के द्वारा (Using colours )
मानचित्रों पर विश्व में, देशों में विभिन्नता, जनसंख्या, खनिज पदार्थ, कषि, व्यापार के आधार पर दिखाई जा सकती है। इसके लिये मानचित्र पर रंगों का प्रयोग किया जाता है। अध्यापक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रंगों का प्रयोग सही करें। इससे अध्यापक घटनाओं, तिथियों, लक्षण की जानकारी देकर विविधता ला सकता है। इससे किसी स्थान की सांस्कृतिक, भौतिक, राजनैतिक, भूगोलिक स्थिति की जानकारी, धरातल की रचना घनी आबादी वाले देश कम आबादी वाले देश विकसित तथा विकासशील देश का ज्ञान मानचित्र द्वारा करवा
4.संकेतो द्वारा (Using Symbols)
मानचित्रों की सांकेतिक भाषा द्वारा रेल मार्गो, सड़को, शहरों, नदियों, समुन्द्रो, पठारों, घाटियों तथा समतल भूमि का ज्ञान दिया जा सकता है। पच्ची के धरातल पर पाई जाने वाली अनगिनत आकतियां तथा वस्तुओं को प्रकट करने के लिये मानचित्रों में विशेष चिन्हों या परम्परागत चिन्हों का प्रयोग किया जाता है जो सैनिको के भी काम आता है।
5.क्षेत्रफल द्वारा (Using Area)
दो महाद्वीप अथवा दो देशों के क्षेत्र का तुलनात्मक अध्ययन करवाया जा सकता है। यदि यह दोनों एक ही मानचित्र पर है तथा एक ही मापक द्वारा बनाए हुए हैं तो अध्यापक उन्हें दो बिन्दुओं के बीच की प्रदर्शित दूरी उन्हीं दो स्थानों के बीच की प्रत्यक्ष दूरी के परस्पर सम्बन्ध को भापकर बता सकता है। मानचित्र मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं फ्लैट मानचित्र, राहत मानचित्र, स्केच मानचित्र ।
1.मानचित्रों की उपयोगिता (Uses of Maps)
मानचित्रों की सामाजिक अध्ययन शिक्षण में निम्नलिखित उपयोगिता है पाठ को रुचिकर बनाने में सहायक (Helpful in making the lesson interesting) मानचित्रों की सहायता से पाठ को रूचिकर बनाया जा सकता है, क्योंकि यह वास्तविक रूप दिखाने में मदद करते है। सर्वप्रथम सरल मानचित्र दिखाकर बच्चों में रुचि को पैदा किया जा सकता है।
2.उपयुक्त जानकारी (Relevant Information)
मानचित्र द्वारा पक्षी के धरातल से सम्बन्धित भागों को प्रदर्शित किया जा सकता है। कौन सा स्थान किसी दूसरे स्थान से कितनी दूरी पर है। किसी विशेष फसल, खनिज सम्पदा आदि का विवरण देश या संसार की दृष्टि से कैसा है? इस तरह की बहुत सी बातों की जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से मानचित्र से उपयुक्त कोई साधन नहीं है।
3.कठिन ज्ञान को सरल बनाने में सहायक (Helpful in making the difficult knowldege easy)
विभिन्न राज्यों की सीमाओं का ज्ञान, राजधानियों की जानकारी, महत्वपूर्ण स्थानों के विवरण को मानचित्र की सहायता से सरल ढंग से दिया जा सकता है।
4.जलवायु तथा वनस्पति की जानकारी (Information about climate and vegetation)
किसी भी स्थान की जलवायु, वनस्पति आदि की जानकारी मानचित्र द्वारा सरलता से प्राप्त की जा सकती है।
5.ऐतिहासिक घटनाओं का उपयुक्त ज्ञान (Proper knowledge of Historical events)
मानचित्रों द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं को विद्यार्थियों के समक्ष उपयोगी ढंग से पढ़ाया जा सकता है।