Mera Bachpan hindi kabita

                              हिन्दी कविता 


 याद पुरानी लौट चली है, वापस मेरे गाँव में । 

मेरे बचपन ! मुझे ले चलो, पनघट वाले गाँव में | 


ताल किनारे बाघ में खेले, गिल्ली-डंडा, गेंद-तड़ी ।

 साथी मिलकर सभी चिढ़ाते, शीला कैसी धूल पड़ी ॥

 न कोई हरिजन, न कोई पंडित, होली खेले गाँव में ।





 दादा, पिता, बुआ, चाचा का, बहुत बड़ा संसार मिला। 

आँखे नम हो जाती, चाची से कैसा मीठा प्यार मिला ॥ 

माँ का आँचल मुझे बुलाए, दूध-दही के गाँव में 


बधुआ, चना, मटर, सरसों, अब सब सपने की बातें हैं।

 शहरी संस्कार संकोची, मन मसोस रह जाते हैं । 

महुआ जामुन, आम बिनते, फिरते थे हम गाँव में , 


बैल हांकते कोल्हू चलते, पकते रस की गंध कहाँ । 

होला मूंगफली की जैसी, पकवानों में गंध कहाँ ॥ 

चोरी से गन्ने लेने अब, पहुँच न पाते गाँव में


प्रो- डॉ प्रमोद कुमार  क्षत्रिय




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