पियाजे का नैतिक सिद्धातं ctet 2022
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| जिन पियाजे |
नैतिक सोच लोग कैसे सोचते हैं? कि क्या सही है और क्या गलत है? क्या नैतिक सवालों पर बच्चे भी वैसे ही विचार करते हैं जैसे कि वयस्कर पियाजे के पास इन सवालों के लेकर कुछ विचार थे और लॉरेंस कोलबर्ग के पास भी कुछ विचार थे। पियाजे का सिद्धातं बच्चे नैतिक मुद्दो के बारे में है, इसके बारे में पियाजे (1932) ने रूचि जाग्रत की। रूचि जागृत की थी। उन्होंने बहुत अधिक गहराई से चार से बारह साल के उम्र के बच्चों का अवलोकन और साक्षात्कार किया। पियाजे ने बच्चों को कंचे खेलते हुए देखा ताकि वे यह जान सकें कि बच्चों ने खेल के नियम पर किस तरह से विचार किया। उन्होंने बच्चों से नैतिक मुद्दों के बारे में भी बात की जैसे कि सजा और न्याय पियाजे ने पाया कि जब बच्चे नैतिकता के बारे में सोचते हैं, तो वे दो अलग-अलग अवस्थाओं से होकर गुजरते है। • चार से सात साल के बच्चे (बाहरी सत्ता से प्राप्त) नैतिकता दिखाते है जो कि प्याजे के नैतिक विकास के सिद्धातों की पहली अवस्था है। बच्चे न्याय और नियमों को दुनिया के ना बदलने वाले गुणधर्म मानते है उनके लिए न्याय और नियम ऐसी चीजें है जो लोगों के बस से बाहर होती हैं। • सात से दस साल की उम्र में बच्चे नैतिक चिन्तन की पहली से दूसरी अवस्था के बीच एक मिली-जुली स्थिति में होते है। • दस साल या उससे बड़े बच्चे आटोनोमस (स्वतंत्रता पर आधारित) नैतिकता दिखाते है। वे यह बात जान जाते है कि नियम और कानून लोगों के बनाए हुए है। और किसी के कार्य का मूल्यांकन करने में वे कार्य को करने वाले व्यक्ति के इरादों और कार्य के परिणामों के ऊपर भी विचार करते हैं। क्योंकि छोटे बच्चे बाहरी सत्ता वाली नैतिकता के स्तर पर होते है, वे किसी के व्यवहार के बारे में सही या गलत का निर्णय उस व्यवहार से होने वाले परिणामों को देखकर लेते हैं, न कि व्यवहार कत्र्ता के उद्देश्यों के आधार पर जैसे कि उनके के लिए जानबूझ कर तोड़े गए एक कप की तुलना में हादसे में 12 कप टूटने की घटना ज्यादा बुरी है। जैसे बच्चे स्वतन्त्र अवस्था पर आने लगते हैं, वैसे-वैसे किसी काम को करने वाले का उद्देश्य इरादा उनके नैतिक चिन्तन का एक आवश्यक बिन्दु बनने लगता है। बाहरी सत्ता के आधर पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे यह भी मानते हैं कि नियम न बदलने वाली चीज है और यह नियम किसी शक्तिशाली सत्ता के द्वारा बनाए गए हैं। प्याजे ने छोटे बच्चों को सुझाया कि वह कचे के खेल के नए नियम बनाएं, तो छोटे बच्चों ने मना कर दिया। दूसरी तरफ बड़े बच्चों ने परिवर्तन को स्वीकारा और पहचाना कि नियम सिर्फ हमारी सुविधा के लिए बनाए गए हैं, जिन्हें बदला जा सकता है। बाहरी सत्ता के आधार पर नैतिक चिन्तन करने वाले बच्चे तुरंत न्याय की धारणा में भी विश्वास रखते हैं। यानि कि अगर एक नियम तोड़ा जाता है तो सजा भी मिलनी चाहिए। छोटे बच्चे मानते हैं कि अगर किसी चीज को खंडित किया या तोड़ा गया है तब यह काम अपने आप सजा से जुड़ जाता है। इसीलिए छोटे बच्चे जब भी कोई गलत काम करते हैं तब चिन्ता से अपने आसपास देखने लगते हैं. यह सोचकर कि उन्हें सजा तो मिलेगी। तुरंत न्याय का सिद्धान्त यह भी कहता है कि अगर किसी के साथ कुछ दुर्भाग्यपूर्ण हुआ हो तो उस व्यक्ति ने जरूर पहले कुछ किया होगा, जिसके परिणास्वरूप ऐसा हुआ। बड़े बच्चे जो नैतिकता की स्वतन्त्रता रखने लगते हैं.. यह पहचानते है कि सजा तभी मिलती है जब किसी ने कुछ गलत होते देख लिया हो और उसके बाद भी जरूरी नहीं कि सजा मिले ही।
नैतिक तर्क को लेकर इस तरह के परिवर्तन कैसे आते हैं? पियाजे मानते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते है उनकी सोच सामाजिक मुद्दों के बारे में गहरी होती चली जाती है प्याजे का मानना है कि सामाजिक समझ साथियों के साथ आपसी लेन देन से आती है। जिन साथियों के पास एक जैसी शक्ति और ओहदा होता है वहां योजनाओं के बीच समझौता किया जाता है और सहमत न होने पर तर्क दिया जाता है और आखिर में सब कुछ ठीक हो जाता है। अभिभावक और बच्चे के रिश्तों में जहां अभिभावक के पास शक्ति होती है लेकिन बच्चों के पास नहीं, वहां नैतिक तर्क की समझ को विकसित करने की संभावना कम रहती है। क्योंकि अधिकतर नियम आदेशात्मक तरीके से दिए जाते हैं।
