विकृति का नाम है चिंता
मित्रो! हमारे स्वभाव और हमारी आदतों में कैसी कैसी विकृतियाँ भरी पड़ी हैं, जो हमको चिंताओं डुबोए रहती हैं। चिंताओं से क्या समस्याओं का हल हो सकता है, जरा बताना। नहीं साहब! हमारी लड़की बड़ी हो गई है, उन्नीस साल की हो गई है। उसका ब्याह करना है, इसी की चिंता खाए जा रही है। तो बेटे! चिंता करने से क्या तेरी लड़की का ब्याह हो जाएगा ? नहीं साहब! हम तो वहाँ जाने वाले थे-लड़का देखने, पर हमारा तो मन ही नहीं किया। बस, चिंताओं में बैठे रहते हैं कि लड़की बड़ी हो गई है। तो क्या लड़की खाए जाती या चिंता खाए जाती है, या शादी खाए जाती है ? अरे साहब! लड़की तो बेचारी अपने घर में बैठी रहती है। अभी तो उसका ब्याह हुआ भी नहीं है। मित्रो ! ब्याह से कोई नुकसान नहीं है और लड़की से भी नुकसान नहीं है फिर नुकसान किससे है ? चिंता से नुकसान है। चिंता क्या बीमारी है ? बेटे! चिंता एक विकृति का नाम है। निराशा एक विकृति का नाम है। क्षोभ एक मानसिक विकृति का नाम है, भय एक मानसिक विकृति का नाम है। और ये विकृतियाँ हमको इतना ज्यादा कष्ट देती हैं, जैसे कि मैंने आपसे कहा था कि असंयम हमारे शरीर को नष्ट करके रख देता है। इसी तरीके से मानसिक असंतुलन हमारे दिमाग को, जो बेशकीमती शरीर से हजार गुना कीमती है, तहस-नहस करके रख देता है। यदि स्थूलशरीर की कीमत एक रुपया है, तो सूक्ष्मशरीर की कीमत दस रुपये है। यह हमारा सूक्ष्मशरीर, हमारा दिमाग इतना गजब का है कि इससे आदमी पैसा कमाता है, यश कमाता है, विद्वान बन जाता है, नेता बन जाता है और शरीर से मजबूत बन जाता है, बलवान बन जाता है। हाँ साहब! मैं पहलवान बन जाऊँगा । हाँ बेटे! बन जाएगा। शरीर से और क्या बनेगा ? साहब! ताकतवर बन जाऊँगा, और गुंडा बन जाऊँगा। अच्छा बन जा । गुंडा बन जाऊँगा, तो जा दो को गाली देना, तो चार इकट्ठे होकर तेरी अक्ल ठिकाने लगा देंगे।
नकारात्मक न होने दें चिंतन
मित्रो! आदमी निगेटिव चिंतन करने की अपेक्षा पॉजिटिव चिंतन करना शुरू कर दे तो उसको मस्ती आ सकती है, हँसी आ सकती है और खुशी हो सकती है और आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट दिखाई पड़ सकती है। अध्यात्म इसी का नाम है। आप परिस्थितियों से मुकाबला कीजिए। आपकी बीबी गुस्सा करने वाली है। हाँ साहब! गुस्सा करने वाली है। तो फिर यह बताइए कि जिन लोगों की ब्याह शादी नहीं हुई है, वे खाना अपने हाथ से पकाते हैं कि नहीं? हाँ साहब! फिर आपकी बीबी तो खाना पका देती है। घर की चौकीदारी करती है। आपके बच्चे पैदा करती है और गाली देती है, तो हर्ज की क्या बात है ? आप अपना दिमाग क्यों खराब कर रहे थे। खामखाँ दिमाग खराब करता रहता है। अरे! एक बार गाली देती होगी। हाँ साहब! कभी-कभी गाली देती है। चौबीस घंटे नहीं देती। महीने में एक-दो दिन गाली देती है। चौबीस घंटे खाना पकाती है, घर की रखवाली करती है। फिर बेटे! इससे तेरा क्या हर्ज हो गया ?
बेशकीमती है हमारा मस्तिष्क
मित्रो! सेहत की कीमत, शरीर की कीमत यदि एक रुपया मानी जाए, तो दिमाग की कीमत दस रुपये या एक सौ रुपये मानी जाएगी और माननी चाहिए। इतना कीमती हमारा मस्तिष्क, इतने कीमती हमारे साधन किस के बुरे तरीके से तबाह हुए, आपने देखा नहीं! आप देखिए f कि यह किससे तबाह होता है? समस्याओं से ? नहीं, समस्याओं से तबाह नहीं होता। हमारी भीतर वाली कमजोरियों से, हमारे दिमाग की विकृतियों से, दृष्टिकोण 'के अवांछनीय होने की वजह से हमारा दिमाग खराब • होता है और असंतुलित होता है। असंतुलन वह है, जिसने हमारे जीवन को, हमारी नींद को हराम कर दिया है। असंतुलन वह है, जिसने हमारे चारों ओर भय का वातावरण खड़ा कर दिया है। असंतुलन वह है, जिसने हमें खीज में दबा दिया है। असंतुलन वह है, जिसने हमें प्रत्येक मित्र को शत्रु के रूप में दिखा दिया। हर मित्र हमको वैरी * दिखाई पड़ता है। हमको अपनी बीबी वैरी दिखाई पड़ती है। देखिए किसी दिन भाग जाएगी। और बेटा बड़ा हो • जाएगा, तब जाने क्या हो सकता है? यह दिमाग इसी • तरह से खराब होता रहता है।
