नारी सशक्तिकरण
भारत में नारी चौराहे पर खड़ी है एक तरफ चांद को छूने की कोशिश करती हमारी महिला है वैज्ञानिक खेलों के मैदान में तिरंगा फहराती खिलाड़ी सेना में अपना शोर्य दिखाती सैनिक या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सकारात्मक भूमिका निभाती भारतीय नारी और हर जगह भारत का मान बढ़ा रही है वहीं दूसरी तरफ महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता बताती सामाजिक कार्यकर्ताओं की फौज है जो भारत में महिलाओ की दिनहिंता को प्रदर्शित करते हुआ उसके सामर्थक को चुनौती दे रहे हैं कभी कभी ऐसा लगता है कि जो संघर्ष उस सोच से निकल रहा है जिसमें भारतीय इस दिल को पश्चिमी नजरिए से देखा जा रहा है मैंने कहीं पढ़ा था कि भारत में जितनी महिलाएं की आबादी है पूरे यूरोप की आबादी उससे भी कम है किस देश में विभिन्न बोली भाषा पहनावा अचार आचरण विचार और संस्कार हो उसकी संस्कृति की क्षमता को पश्चिमी नजरिए से समझा ही नहीं जा सकता है
आजकल समाज में एक नई परिभाषा गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है जो नारी पूरी जैसी बन सकती है वही सशक्त हैं तो मूल प्रश्न यह है की क्या नारी को पुरुष बनना है उसके जैसा बनना है ? क्या अधिकारों की लड़ाई ही हमे पुरुषों की बराबरी देती है या जिस तरह का जीवन पुरुष जी रहे हैं वैसे स्वच्छता महिलाएं में शक्ति करण की उपस्थिति को दर्ज मान लेगी ऐसी अनगिनत तर्क है जो नारी शक्ति करण के खोखलेपन उजागर करते हैं और कर रहे हैं तो भारतीय नारी को कैसा होना चाहिए
और उसकी स्वयं को परिवार को समाज को और राष्ट्र को देखने की दृष्टि किया हो यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है हम भारतीय लोग स्त्रियों के प्रती अत्यंत संवेदनशील हैं सुनने में यह बात हास्यास्पद भी लग सकती है लेकिन सत्य यही है आज भी किसी स्त्री के प्रति कोई अत्याचार होता है तो हमारा समाज उस स्त्री के साथ ही खड़ा होता है हम स्त्रियों को कितना समान देते है यह बताने के लिए इतना ही खाफी होगा की वर्ष में आने वाले नवरात्र केवल और केवल देवी की उपासना और उसकी शक्ति को ही समर्पित है भक्ति रूप में मीरा सखी रूप में राधा ,पत्नी रूप में सावित्री , प्रतीक्षा रूप में अहिल्या ,वात्सल्य रुपए शराबी ,ज्ञान रूपी गार्गी ,सभिमान रूपी रानी लक्ष्मी बाई , पवित्रा रूप में सीता , जैसी न जाने कितनी विभूतियाँ हैं, जो न केवल हमारी प्रेरणा की स्त्रोत हैं, अपितु हमारा जीवन उनके आस पास केन्द्रित है। जो लोग भारत में महिलाओं को अशक्त कमजोर और दलित मान रहे हैं, वास्तव में वे अपनी ही मानसिक अपरिपक्वता का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इन कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं को पश्चिमी देशों के ही सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और धार्मिक संगठनों का सर्मथन मिल रहा है।
इस देश के प्रबुद्ध नागरिक तक यह विचार नहीं कर पाता कि भारत में महिलाओं की स्थिति के बारे में हम बहुत अच्छे तरीके से विचार कर सकते हैं या इस देश से लगभग अनभिज्ञ विदेशी प्रबुद्ध !
जब हम यह प्रश्न उठाते हैं कि भारतीय नारी की दृष्टि क्या हो ? उससे पहले जरूरी है कि हम भारतीय नारी को किस दृष्टि से देखते हैं, यह तय हो ! यदि हम भारतीय नारी को देह भोगवादी दृष्टि से ही देखेंगें, तो उसकी योग्यता, सामथ्र्य, विचारशीलता, विद्वता, सहमति और असहमति का कोई न तो स्थान होगा और न ही मूल्य ! तब हम यह सोच ही नहीं पाएँगे कि हम उसकी गरिमा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उसके स्वाभिमान का निरादर कर रहे हैं और उस पर अत्याचार कर रहे हैं। लेकिन अगर हम नारीको देह भोगवादी दृष्टि से ही देखेंगे,
तो उसकी योग्यता, सामर्थय, विचारशीलता, विद्वता, सहमति और असहमति का कोई न तो स्थान होगा और न ही मूल्य ! तब हम यह सोच ही नहीं पाएँगे कि हम उसकी गरिमा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उसके स्वाभिमान का निरादर कर रहे हैं और उस पर अत्याचार कर रहे है। लेकिन अगर हम नारी के प्रति अपनी सोच को मातृत्व के भाव पर रखेंगे तो हम निश्चित ही उसके सामर्थय के आगे नतमस्तक हो जायेंगें। नारी जो स्वयं सिद्ध है, शक्ति स्वरूपा है, उसको आश्रित बताना या दलित के रूप में रेखांकित करना ना केवल उसको अपमानित करना है अपितु हमारे अपने विचार सामर्थय के खोखलेपन को उजागर करना भी है।
तो क्या यह मान लेना चाहिए कि भारत में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी है? तो मैं कहूंगी कि हा भारत में स्त्रियों की स्थिति पूरे विश्व के मुकाबले बहुत अच्छी है, लेकिन पुरुषों की स्थिति बहुत दयनीय है। उनको ऐसी शिक्षा नहीं मिल रही, जिससे वो अपना और दूसरे का सम्मान करना सीखते हों ! उन्हें वो शिक्षा भी प्राप्त नहीं हो रही है, जिसके कारण उनमें ऐसी दृष्टि विकसित हो सके कि अत्याचार करने को वे शक्तिशाली होना न समझें। वे समानता का व्यवहार सीखने में असफल हो रहे हैं, न्याय और अन्याय में फर्क करना उन्हें सीखना ही होगा। भारतीय सनातन परंपरा में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में महिलाओं को स्नेह, संवेदना, समानता, न्याय, कर्मठता, समन्वय, सामथ्य और वात्सल्य जैसे ना जाने कितने ही गुण ईश्वर द्वारा प्रदत्त हैं। समस्या यह है कि वर्तमान सामाजिक परिवेश में जो शिक्षा और संस्कार विशेष रूप से महिलाओं को दिए जा रहे हैं, उनमें इन गुणों पर पड़ रही धूल को हटाने का कोई प्रयत्न ही होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। पुरुष प्रधान समाज की विडम्बना यह है। कि वह अपने मानकों, अपनी कसौटी और अपनी दृष्टियों से सभी के उपयोग और उपभोग को तय करता है।
इसलिए उसको भारतीय नारी के सशक्तिकरण के लिए मुहिम चलाने की आवश्यकता महसूस होने लगती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि वह स्वयं सही अर्थों में शिक्षित बने तो भारत में महिलाओं के प्रति ऐसी विचारों की आवश्यकता ही नहीं रहेगी, क्योंकि ये याद रखिए कि भारत में महिलाएं सिर्फ भोगवादी देह नहीं हैं, ये देवियां है।
Tags:
आर्टिकल
